3/02/2009

"तुम चाहो तो"

"तुम चाहो तो"

एक अधूरे गीत का
मुखडा मात्र हूँ,
तुम चाहो तो
छेड़ दो कोई तार सुर का
एक मधुर संगीत में
मै ढल जाऊंगा ......

खामोश लब पे
खुश्क मरुस्थल सा जमा हूँ
तुम चाहो तो
एक नाजुक स्पर्श का
बस दान दे दो
एक तरल धार बन
मै फिसल जाऊंगा......

भटक रहा बेजान
रूह की मनोकामना सा
तुम चाहो तो
हर्फ बन जाओ दुआ का
ईश्वर के आशीर्वाद सा
मै फल जाउंगा.....


राख बनके अस्थियों की
तिल तिल मिट रहा हूँ
तुम चाहो तो
थाम ऊँगली बस
एक दुलार दे दो
बन के शिशु
मातृत्व की ममता में
मै पल जाऊंगा .....

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SeemaGupta/tum_chaho_to.htm

2/23/2009

"झील को दर्पण बना "

"झील को दर्पण बना"

रात के स्वर्णिम पहर में
झील को दर्पण बना

चाँद जब बादलो से निकल
श्रृंगार करता होगा
चांदनी का ओढ़ आँचल
धरा भी इतराती तो होगी...


मस्त पवन की अंगडाई
दरख्तों के झुरमुट में छिप कर

परिधान बदल बदल
मन को गुदगुदाती तो होगी.....

नदिया पुरे वेग मे बह
किनारों से टकरा टकरा

दीवाने दिल के धड़कने का
सबब सुनाती तो होगी .....
खामोशी की आगोश मे रात
जब पहरों में ढलती होगी
ओस की बूँदें दूब के बदन पे
फिसल लजाती तो होगी ......

दूर बजती किसी बंसी की धुन
पायल की रुनझुन और सरगम
अनजानी सी कोई आहट आकर
तुम्हे मेरी याद दिलाती तो होगी.....


http://hindivangmay1.blogspot.com/2009/02/blog-post_27.html

2/17/2009

"और मै ऋणी हो गयी....."


"और मै ऋणी हो गयी....."

"कल शाम को आयु ने आप सभी के स्नेह और आशीर्वाद से भरे बधाई संदेश पढे . पढ़ते वक्त पल पल उसकी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी और वो हैरान थी की जिनको वो जानती तक नही उन्होंने इतने प्यार भरे बधाई संदेश लिखे है उसके लिए . उसकी आँखों से जैसे खुशी छलक छलक जा रही थी , हर शब्द के साथ चेहरे पे मुस्कुराहट बढती जा रहे थी और हर कमेन्ट करने वाले आदरणीय ब्लोगर के बारे मे जानने की उत्सुकता भी " मम्मा ये सब तो मुझे नही जानते ना फ़िर भी सबने मुझे विश किया इतनी प्यारी प्यारी दुआए लिखी , कितने अच्छे हैं न सब ' तब मैंने कहा ये सब ब्लॉग परिवार के सदस्य हैं मुझे जानते हैं और मैं सबको . जीवन मे इतने लोगो का एक साथ इतना प्यार आशीर्वाद उसे पहली बार मिला था , वो पल जो उसे खुशी दे रहा था मै शब्दों मे बयाँ नही कर सकती . आप सब की दुआओं भरे अल्फाज जो उसकी इतनी खुशी का कारण बने जो मैंने आयु की आँखों उसके चेहरे पर देखि मै आप सब की ऋणी हो गयी .... आज के इन चंद शब्दों का मकसद आप सभी तक अपने और आयु की तरफ से आभार प्रकट करना था .
Regards

2/16/2009

"एक छोटी सी मुलाकात एक खुशी से..."

"एक छोटी सी मुलाकात एक खुशी से..."

" आज आप सब से एक छोटी सी खुशी बांटने का दिन है.....मेरी ऐसी खुशी जो मेरी जिन्दगी मे बहुत मायने रखती है ,,,,जिसने मुझे जीना सिखाया जो मेरे बहुत से फैसलों में मेरा साथ देती है.....जिसको देख कर मै अपना हर दर्द पल भर को भूल जाती हूँ......जिसके बिना मै आज अपने आप को अधुरा पाती हूँ.......जिसके आने से मेरे जीवन का रुख ही मुड गया......जी हाँ और उस खुशी का नाम है " आयुषी" मेरे प्यारी सी बेटी जिसका आज १२ जन्मदिन है ......जो ६ कक्षा की छात्र है और आज ही उसके final exams भी शुरू है........आज की दो पंक्तियाँ "आयु" के नाम ........
"तुम हर दुःख हरने आई हो......."

जीवन की सुनी बगिया मे...

असंख्य पुष्प बन तुम लहराई हो,

चंचल तितली, मस्त पवन...

तुम शीतल चंदन बन कर छाई हो,

आस , उम्मीद, हो प्यार मेरा तुम ,

अंधियारे में जुगनू सी जगमगाई हो,

नन्हे नन्हे कोमल स्पर्श तुम्हारे...

तुम हर दुःख हरने आई हो.......

2/14/2009

"इश्क मोहब्बत प्यार सनम"


"इश्क मोहब्बत प्यार सनम"

"प्यार कोई व्योपार नहीं,
किसी की जीत या हार नहीं,
प्यार तो बस प्यार ही है,
रहमो करम का वार नहीं ..."

2/09/2009

"मै डरती हुं "

"मै डरती हूँ "

मै जानती हूँ .........
मेरे खत का उसे इंतजार नही
मेरे दुख से उसे सरोकार नही ,
मेरे मासूम लफ्ज उसे नही बहलाते
मेरी कोई बात भी उसे याद नही.
मेरे ख्वाबों से उसकी नींद नही उचटती
मेरी यादो मे उसके पल बर्बाद नही
मेरा कोई आंसू उसे नही रुलाता
उसे मुझसे जरा भी प्यार नही
कोई आहट उसे नही चौंकाती
क्योंकि उसे मेरा इन्तजार नही
मगर मै डरती हूँ उस पल से
जब वो चेतना में लौटेगा और
पश्चाताप के तूफानी सैलाब से
गुजर नही पायेगा ...जड हो जाएगा
मै डरती हूँ ....बस उस एक पल से

http://vangmaypatrika.blogspot.com/
http://swargvibha.0fees.net/kavita/all%20kavita/Seema%20Gupta/main%20darati.html

2/04/2009

"एहसास "

"एहसास"

हर साँस मे जर्रा जर्रा
पलता है कुछ,
यूँ लगे साथ मेरे
चलता है कुछ.
सोच की गागर से
निकल शब्द बन
अधरों पे खामोशी से
मचलता है कुछ.
ये एहसास क्या ...
तुम्हारा है प्रिये ???
जो मोम बनके मुझमे ,
बर्फ़ मानिंद .....
पिघलता है कुछ

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1/28/2009

"फर्ज निभाने को"

"फर्ज निभाने को"
तन्हाइयों ने फ़िर

बीज तेरी यादो के रोपे

मन के बंजर खलिहानों मे

घावो की पनीरी अंकुरित हुई

बीते लम्हों की फसल उगाने को

तिल तिल जल के राख़ हुए

अरमान उर्वरक बन बिखर गये

दिल दरिया अश्रु बह निकले

सींच उन्हें अपना "फर्ज निभाने को "

1/23/2009

"हाँ खैरात हूँ मै"

"हाँ खैरात हूँ मै"

रहमो करम खैरात हूँ मै
हाँ अपने दर से ठुकरा दो मुझे.
खरोंच के फैंक दो स्मृतियों को मेरी
हाँ जहन से अपने मिटा दो मुझे
मेरा अस्तित्व बोध भी सताये ना तुम्हे
हाँ बीती बात की तरह झुटला दो मुझे
मेरे साये से भी शिकवा तुमको
हाँ उड़ते धूल के गुबार में मिला दो मुझे
ख्वाबों मे भी आके सता जाऊँ न कभी
हाँ ऐसी कोई संगदिल सजा दो मुझे

नज़र फेर के लेके शिकन इक चेहरे पे
हाँ गुजरी एक रात सा दगा दो मुझे
हाँ खैरात हूँ मै .....ठुकरा दो मुझे


1/19/2009

"मर्यादा कौन सी निभा रहे हो"

"मर्यादा कौन सी निभा रहे हो"

वेदना के वृक्ष को
अश्रुओं से सींच कर
सुख और स्वयं के मध्य
लक्ष्मण रेखा खिंच कर
मर्यादा कौन सी निभा रहे हो
मेरे लिए असंख्य वृक्ष
काँटों के लगा रहे हो
उग रहे है घने जंगल
दुःख के चंहू ओर मेरे
लुप्त हो रही प्रसन्न्ता ये
हृदय से क्षण क्षण मेरे
वृक्ष वेदना का उगा है
फल फूल भी आयेंगे
जख्मों के पुष्प खिलेंगे
ग़मों की बौर आयेगी क्या?
इस जंगल से सुरभि लेकर
हवा मेरी ओर आएगी क्या ?

1/15/2009

"प्रेम"

"प्रेम"

भावों से भी व्यक्त ना हो,
ना अक्षर में बांधा जाए
खामोशी की व्याकरण बांची
अर्थ नही कोई मिलपाये
अश्रु से भी प्रकट ना हो
ना अधरों से छलका जाए
मौन आवरण मे सिमटा
ये प्रेम प्रतिपल सकुचाये


http://vangmaypatrika.blogspot.com/2009/01/blog-post_15.html

1/12/2009

"विमुखता"

"विमुखता"

खामोशी तेरे रुखसार की
तेज़ाब बन मस्तिष्क पर झरने लगी
जलने लगा धैर्य का नभ मेरा
और आश्वाशन की धरा गलने लगी
तुमसे वियोग का घाव दिल में
करुण चीत्कार अनंत करने लगा
सम्भावनाये भी अब मिलन की
आहत हुई और ज़ार ज़ार मरने लगी
था पाप कोई उस जनम का या
कर्म अभिशप्त हो फलिभुत हुआ
अपेक्षा की कलंकित कोख में
विमुखता की वेदना पलने लगी....






1/05/2009

"वेदना का वृक्ष"








"वेदना का वृक्ष"

विद्रोह कर आंसुओ ने,
नैनो मे ढलने से इंकार किया
ओर सिसकियाँ भी
कंठ को अवरुद्ध करके सो गयी
स्वर का भी मार्गदर्शन
शब्दों ने किया नही
भाव भंगिमाएं भी रूठ कर
लुप्त कहीं हो गयी
अनुभूतियों का स्पंदन भी
तपस्या में विलीन हुआ
वेदना के वृक्ष की ऊँचाइयों को
स्पर्श दिल ने जब किया .......


1/02/2009

"कैसे तुम्हे भुलाऊ "



"कैसे तुम्हे भुलाऊ "
गर ऐसे याद करोगी मुझको,
कैसे मै जी पाउँगा ? ??

ये शब्द तुम्हारे ....
बाँध तोड़ संयम के सारे , 
बीते लम्हों के कालीन बिछाएं ,

मौन स्वरों के गलियारे मे ,
यादो के घाव पग धरते जायें,

सानिध्य का एहसास तुम्हारा
विचलित कर मन को भरमाये ,

संकल्प तुम्हारे नृत्य करे और ,
बोल गूंज कर प्रणय गीत सुनाये
"कैसे तुम्हे भुलाऊ "


http://hindivangmay1.blogspot.com/2009/01/blog-post_02.html

12/31/2008

" नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं"



" नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं"

दुखदायी जो पल थे उन्हें भुलाएं
मधुर स्म्रतियों से नव वर्ष को गले लगायें ,
करते है दुआ हम रब से सर झुकाके ...
इस साल के सारे सपने पुरे हो आपके.
"नव वर्ष २००९ - आप सभी ब्लॉग परिवार और समस्त देश वासियों के परिवारजनों, मित्रों, स्नेहीजनों व शुभ चिंतकों के लिये सुख, समृद्धि, शांति व धन-वैभव दायक हो॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ इसी कामना के साथ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं "

12/30/2008

"यादों की पालकी"





"यादों की पालकी"

उनीदीं आँखों को मलते
धुली शाम सी निखरी
खामोशी के साये तले
आकाँक्षाओं की ऊँगली थामे
अनजानी ख्वाइशों से सवंरी
भावनाओ के आँगन में
लरजती उतर आती है
तेरी यादों की पालकी
और कुछ अधूरे शब्दों के
आँचल मे लिपटी तेरी बातें
किरच किरच बिखरने लगती हैं....
" रोप लूंगा तुम्हे अपनी आँखों मे
जमीन पे बिखरने से पहले..."




12/27/2008

"हाल-ऐ-दिल"


"हाल-ऐ-दिल"

पलकों पे आए और भिगाते चले गए,
आंसू तुम्हारे फूल खिलाते चले गए..

तुमने कहा था हाल-ऐ-दिल हम बयाँ करें
हम पूरी रात तुम को बताते चले गए...

मुद्द्त के बाद बोझिल पलकें जो हो रही,,
हम लोरियों से तुम को सुलाते चले गए...

तुम्ही को सोचते हुए रहने लगे हैं हम,
तुम्ही के अक्स दिल में बसाते चले गए....

अब यूँ सता रहा है हमें एक ख़याल ही,
हम तुम पे अपना बोझ बढाते चले गए ........


http://vangmaypatrika.blogspot.com/2008/08/blog-post_27.html

12/24/2008

'मन की अभिलाषा"



"मन की अभिलाषा"

मन की अभिलाषा
दिशाहीन , आवारा
कभी किसी पथ
कभी उस डगर
चंचल चपल निर्भीक
बेबाकी की चुनर ओढ़
इतराती, इठलाती
अनुशासन की देहरी लाँघ
दायरों की हँसी उडा
अधीरता को निमंत्र्ण दे
"ना जाने"
क्या पाने को मचल रही...
मन की अभिलाषा
दिशाहीन , आवारा

12/22/2008

"फिर उसी शाख़ पर"




"फिर उसी शाख़ पर"

गीत कोई आज, यूँ ही गुनगुनाया जाए,
शब्दों को सुर-ताल से सजाया जाए
बेचैनियों को करके दफ़्न
दिल के किसी कोने में,
रागिनियों से मन को बहलाया जाए
ख़ामोशी के आग़ोश से
दामन को छुड़ा कर, ज़रा,
स्वर को अधरों से छलकाया जाए
शक्वों के मौसम को
करके रुख़सत दर से
मोहब्बत की चाँदनी में नहाया जाए
उजालों के आँचल में
सज कर सँवर कर
आईने में ख़ुद से ही शरमाया जाए
परदए-नाज़ो-अंदाज़
उनको दिखलाकर,
ख़िरामा ख़िरामा चल कर आया जाए
बर्क़ को न देकर के
ज़रा भी मोहलत,
फिर उसी शाख़ पर नशेमन बनाया जाए

(शक्वों = शिकायतों
ख़िरामा = आहिस्ता
बर्क़ = बिजली
नशेमन = घोंसला )