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10/26/2009

"किस्मत का उपहास"


"किस्मत का उपहास"

हर बीता पल इतिहास रहा,
जीना तुझ बिन बनवास रहा
ये चाँद सितारे चमके जब जब
इनमे तेरा ही आभास रहा

चंचल हुई जब जब अभिलाषा,

तब प्रेम प्रीत का उल्लास रहा,
तेरी खातिर कण कण पुजा
पत्थरों में भगवन का वास रहा

विरह के नगमे गूंजे कभी
कभी सन्नाटो का साथ रहा
गुजरे दिन आये याद बहुत
"किस्मत" का कैसा उपहास रहा.




















http://swargvibha.freevar.com/oct2009/Gazal/list.html
http://vangmaypatrika.blogspot.com/2009/11/blog-post.html

10/05/2009

तुम चुपके से आ जाना


'तुम चुपके से आ जाना "

सूरज जब मद्धम पड़ जाये
और नभ पर लाली छा जाये
शीतल पवन का एक झोंका
तेरे बिखरे बालों को छु जाए
चंदा की थाली निखरी हो
तारे भी सो कर उठ जाए
चोखट की सांकल खामोशी से
निंदिया की आगोश में अलसाये
बादल के टुकड़े उमड़ घुमड़
द्वारपाल बन चोक्न्ने हो जाये
एकांत के झुरमुट में छुप कर
मै द्वार ह्रदय का खोलूंगी
तुम चुपके से आ जाना
झाँक के मेरी आँखों मे
एक पल में सदियाँ जी जाना

http://vangmaypatrika.blogspot.com/2009/10/blog-post.html

7/06/2009

"तेरे जाने के बाद"

"तेरे जाने के बाद"

आँखों मे जलजले ,
मरुस्थल दिल की जमीन .
भावनाओ की साजिश ,
संभावनाओ का जलना .
धधकते अंगारों से पल,
दर्द का विकराल रूप ,
म्रत्यु से द्वंद ,
पथराये जिस्म का गलना . 
तेरे जाने के बाद......

http://latestswargvibha.blog.co.in/
http://vangmaypatrika.blogspot.com/2009/07/blog-post_20.html

3/30/2009

अश्कों का दीया

"अश्कों का दीया"

रात गमगीन रही
दिल वीरान रहा
कितना खामोश ये आसमान रहा
सिसकियों की सरगोशियाँ उफ़
"अश्कों का दीया "
अंधेरों मे मेहरबान रहा

http://vangmaypatrika.blogspot.com/

2/09/2009

"मै डरती हुं "

"मै डरती हूँ "

मै जानती हूँ .........
मेरे खत का उसे इंतजार नही
मेरे दुख से उसे सरोकार नही ,
मेरे मासूम लफ्ज उसे नही बहलाते
मेरी कोई बात भी उसे याद नही.
मेरे ख्वाबों से उसकी नींद नही उचटती
मेरी यादो मे उसके पल बर्बाद नही
मेरा कोई आंसू उसे नही रुलाता
उसे मुझसे जरा भी प्यार नही
कोई आहट उसे नही चौंकाती
क्योंकि उसे मेरा इन्तजार नही
मगर मै डरती हूँ उस पल से
जब वो चेतना में लौटेगा और
पश्चाताप के तूफानी सैलाब से
गुजर नही पायेगा ...जड हो जाएगा
मै डरती हूँ ....बस उस एक पल से

http://vangmaypatrika.blogspot.com/
http://swargvibha.0fees.net/kavita/all%20kavita/Seema%20Gupta/main%20darati.html

2/04/2009

"एहसास "

"एहसास"

हर साँस मे जर्रा जर्रा
पलता है कुछ,
यूँ लगे साथ मेरे
चलता है कुछ.
सोच की गागर से
निकल शब्द बन
अधरों पे खामोशी से
मचलता है कुछ.
ये एहसास क्या ...
तुम्हारा है प्रिये ???
जो मोम बनके मुझमे ,
बर्फ़ मानिंद .....
पिघलता है कुछ

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http://swargvibha.0fees.net/march2009/Kavita/seema%20gupta.html

1/15/2009

"प्रेम"

"प्रेम"

भावों से भी व्यक्त ना हो,
ना अक्षर में बांधा जाए
खामोशी की व्याकरण बांची
अर्थ नही कोई मिलपाये
अश्रु से भी प्रकट ना हो
ना अधरों से छलका जाए
मौन आवरण मे सिमटा
ये प्रेम प्रतिपल सकुचाये


http://vangmaypatrika.blogspot.com/2009/01/blog-post_15.html

12/27/2008

"हाल-ऐ-दिल"


"हाल-ऐ-दिल"

पलकों पे आए और भिगाते चले गए,
आंसू तुम्हारे फूल खिलाते चले गए..

तुमने कहा था हाल-ऐ-दिल हम बयाँ करें
हम पूरी रात तुम को बताते चले गए...

मुद्द्त के बाद बोझिल पलकें जो हो रही,,
हम लोरियों से तुम को सुलाते चले गए...

तुम्ही को सोचते हुए रहने लगे हैं हम,
तुम्ही के अक्स दिल में बसाते चले गए....

अब यूँ सता रहा है हमें एक ख़याल ही,
हम तुम पे अपना बोझ बढाते चले गए ........


http://vangmaypatrika.blogspot.com/2008/08/blog-post_27.html

12/15/2008

"दृष्टि "

"दृष्टि"

अनंतकाल से ये दृष्टि
प्रतीक्षा पग पर अडिग ,
पलकों के आंचल से
सर को ढांक ,
आतुरता की सीमा लाँघ
अविरल अश्रुधारा मे
डूबती , तरती , उभरती ,
व्याकुलता की ऊँचाइयों को छु
प्रतीक्षाक्षण से तकरार करती
तुम्हारी इक आभा को प्यासी
अनंतकाल से ये दृष्टि
प्रतीक्षा पग पर अडिग




12/10/2008

"मायाजाल"

" मायाजाल"

ह्रदय के मानचित्र पर पल पल
तमन्नाओं के प्रतिबिम्ब उभरते रहे,
यथार्थ को दरकिनार कर
कुछ स्वप्नों ने सांसे भरी...
छलावों की हवाएं बहती रही
बहकावे अपनी चाल चलते रहे,
कायदों को सुला , उल्लंघन ने
जाग्रत हो अंगडाई ली..
द्रढ़निश्चयता का उपहास कर
संकल्प मायाजाल में उलझते रहे,
ह्रदय के मानचित्र पर पल पल
तमन्नाओं के प्रतिबिम्ब उभरते रहे...

12/08/2008

"ख्वाबों के आँगन "



"ख्वाबों के आँगन "

ख्वाबों के आँगन ने अपना
कुछ ऐसे फ़िर विस्तार किया,
वर्तमान ने हकीक़त ,
का दामन ठुकराया ,
अस्तित्व ने अपने,
सामर्थ्य से मुख फैरा,
शीशमहल का निर्माण किया...
विवशता का परित्याग कर ,
दर्पण मचला जिज्ञासा का,
भ्रम की आगोश मे,
मनमोहक श्रिंगार किया ...
बहते दरिया की भूमि पर ,
इक नीवं बना अरमानो की,
हर तर्ष्णा को पा लेने का,
निरर्थक एक प्रयास किया ...
ख्वाबों के आँगन ने अपना

कुछ ऐसे फ़िर विस्तार किया.........



http://vangmaypatrika.blogspot.com/2008/12/blog-post_8134.html

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/3846072.cms#write

11/10/2008

"खामोश सी रात"





"खामोश सी रात"

सांवली कुछ खामोश सी रात,
सन्नाटे की चादर मे लिपटी,
उनींदी आँखों मे कुछ साये लिए,
ये कैसी शिरकत किए चली जाती है....
बिखरे पलों की सरगोशियाँ ,
तनहाई मे एक शोर की तरह,
करवट करवट दर्द दिए चली जाती है....
कुछ अधूरे लफ्जों की किरचें,
सूखे अधरों पे मचल कर,
लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है...
सांवली कुछ खामोश सी रात अक्सर...


http://vangmaypatrika.blogspot.com/2008/11/blog-post_8604.html
http://rachanakar.blogspot.com/2008/11/blog-post_25.html

11/07/2008

"भ्रम"



"भ्रम"

कल्पना की सतह पर आकर थमा,
अनजान सा किसका चेहरा है.....
शब्जाल से बुनकर बेजुबान सा नाम,
क्यूँ लबों पे आकर ठहरा है....
एहसास के अंगारे फ़िर जलने लगे,
उदासी की चांदनी ने किया घुप अँधेरा है....
क्षतिज के पार तक नज़र दौड़ आई,
किसके आभास का छाया कोहरा है......
वक्त की देहलीज पर आस गली,
कितना बेहरम दर्द का पहरा है.....
साँस थम थम कर चीत्कार कर रही,
कोई नही.. कोई नही ..ये भ्रम बस तेरा है.....

http://vangmaypatrika.blogspot.com/2008/11/blog-post_8266.html

10/20/2008

मौत की रफ़्तार






"मौत की रफ़्तार"

आज कुछ गिर के टूट के चटक गया शायद ..

एहसास की खामोशी ऐसे क्यूँ कम्पकपाने लगी ..

ऑंखें बोजिल , रूह तन्हा , बेजान सा जिस्म ..

वीरानो की दरारों से कैसी आवाजें लगी...

दीवारों दर के जरोखे मे कोई दबिश हुई ...

यूँ लगा मौत की रफ़्तार दबे पावँ आने लगी...


http://hindivani.blogspot.com/2008/10/blog-post_23.html

10/13/2008

विरह का रंग




"विरह का रंग"


आँखों मे तपीश और रूह की जलन,

बोजिल आहें , खामोशी की चुभन,

सिमटी ख्वाईश , सांसों से घुटन ,

जिन्दा लाशों पे वक्त का कफ़न,

कितना सुंदर ये विरह का रंग


(विरह का क्या रंग होता है यह मैं नही जानती . लेकिन इतना ज़रूर है की यह रंग -हीन भी नही होता और यह रंग आँखें नही दिल देखता है)
http://hindivani.blogspot.com/2008/10/blog-post_23.html

10/10/2008

"वहीं पर तुम जहाँ हो काग़जों पर"



"वहीं पर तुम जहाँ हो काग़जों पर"


वहीं पर तुम जहाँ हो काग़जों पर,
वहीं मैं आजकल रहने लगा हूँ .......

जिगर के दिल के हर एक दर्द से मैं,
रवां दरिया सा इक बहने लगा हूँ .......

सुना दी आईने ने दिल की बातें,
तुम्हे मैं आजकल पहने लगा हूँ .........

तुम्हारे साथ हूँ जैसे अज़ल से,
तुम्हारी बात मैं कहने लगा हूँ........

सुनी सीमा हमारे दिल की बातें ???
तुम्हीं से तो मैं सभी कहने लगा हूँ..........



http://swargvibha.freezoka.com/kavita/all%20kavita/Seema%20Gupta/lagu%20hai.html (http://www.swargvibha.tk/)
http://vangmaypatrika.blogspot.com/2008/09/blog-post_15.html

10/03/2008

"सवाल"

"सवाल"

जवाब न बना , रहा एक उलझा सा सवाल बनके ,
बहता रहा मुझमे वो हर लम्हा दर्द-ऐ-ख्याल बनके,
आने से पहले ही जो गुजर जाए बिन कुछ कहे,
वो रहा ऐसे गुजरे वक्त की एक मिसाल बनके

10/01/2008

'दो फूल'


'दो फूल'

मेरी कब्र पे दो फूल रोज आकर चढाते हैं वो,
हाय , इस कदर क्यों मुझे तडपाते हैं वो.
मेरे हाथों को छुना भी मुनासिब न समझा,
आज मेरी मजार से लिपट के आंसू बहाते हैं वो.
हाले यार समझ ना सके अब तलक जिनका,
मेरे दिल पे सर रख कर हाले दिल सुनाते हैं वो.
जिक्र चलता है जब जब मोहब्बत का जमाने मे,
मेरा नाम अपने लब पर लाकर बुदबुदाते हैं वो.
मुझसे मिलने मे बदनामी का डर था जिनको,
छोड़ कर हया मेरी कब्र पे दौडे चले आतें हैं वो.
उनके गम का सबब कोई जो पूछे उनसे ,
दुनिया को मुझे अपना आशिक बतातें हैं वो,
कहे जो उनसे कोई पहने शादी का जोडा वो,
मेरी मिट्टी से मांग अपनी सजाते है वो.
मेरी कब्र पे दो फूल रोज आकर चढाते हैं वो,
हाय , इस कदर क्यों मुझे तडपते हैं वो