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8/21/2008

"नहीं"







"नहीं"

देखा तुम्हें , चाहा तुम्हें ,
सोचा तुम्हें , पूजा तुम्हें,
किस्मत मे मेरी इस खुदा ने ,
क्यों तुम्हें कहीं भी लिखा नहीं .
रखा है दिल के हर तार मे ,
तेरे सिवा कुछ भी नही ,
किस्से जाकर मैं फरियाद करूं,
हमदर्द कोई मुझे दिखता नही.
बनके अश्क मेरी आँखों मे,
तुम बस गए हो उमर भर के लिए ,
कैसे तुम्हें दर्द दिखलाऊं मैं ,
अंदाजे बयान मैंने सीखा नही.
नजरें टिकी हैं हर राह पर ,
तेरा निशान काश मिल जाए कोई,
कैसे मगर यहाँ से गुजरोगे तुम,
मैं तुमाहरी मंजील ही नही,
आती जाती कोई कोई अब साँस है ,
एक बार दिल भर के काश देखूं तुझे,
मगर तू मेरा मुक्कदर नही ,
क्यों दिले नादाँ ये राज समझा नही ..............

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8/04/2008

"याद किया तुमने या नही "




"याद किया तुमने या नही "

यूँ ही बेवजह किसी से, करते हुए बातें,
यूँ ही पगडंडियो पर सुबह-शाम आते जाते
कभी चलते चलते रुकते, संभलते डगमगाते.
मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..


सुलझाते हुए अपनी उलझी हुई लटों क
फैलाते हुए सुबह बिस्तर की सिलवटों को
सुनकर के स्थिर करतीं दरवाजी आहटों को
मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..

बाहों कर करके घेरा,चौखट से सर टिकाके
और भूल करके दुनियाँ सांसों को भी भुलाके
खोकर कहीं क्षितिज में जलधार दो बुलाके
मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ.

सीढ़ी से तुम उतरते , या चढ़ते हुए पलों में
देखुंगी छत से उसको,खोकर के अटकलों में
कभी दूर तक उड़ाकर नज़रों को जंगलों में
मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..

बारिश में भीगते तो, कभी धूप गुनगुनाते
कभी आंसुओं का सागर कभी हँसते-खिलखिलाते
कभी खुद से शर्म करते कभी आइने से बातें
मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..

तुमसे दूर मैने, ऐसे हैं पल गुजारे .
धारा बिना हों जैसे नदिया के बस किनारे..
बिन पत्तियों की साखा बिन चाँद के सितारे..
बेबसी के इन पलों में...
मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ....

7/22/2008

"तन्हाई"





"तन्हाई"



"तन्हाई"











"तन्हाई"


काँटों की चुभन सी क्यों है तन्हाई,
सीने की दुखन सी क्यों है तन्हाई,




ये नजरें जहाँ तक मुझको ले जांयें ,

हर तरफ बसी क्यों है सूनी सी तन्हाई,



इस दिल की अगन पहले क्या कम थी ,


मेरे साथ सुलगने लगती क्यों है तन्हाई



आंसू जो छुपाने लगता हूँ सबसे ,

बेबाक हो रो देती क्यों है तन्हाई




तुझे दिल से भुलाना चाहता हूँ ,

यादों के भंवर मे उलझा देती क्यों है तन्हाई




एक पल चैन से सोंना चाहता हूँ ,

मेरी आँखों मे जगने लगती क्यों है तन्हाई



तन्हाई से दूर नही अब रह सकता,



मेरी सांसों मे, इन आहों मे,

मेरी रातों मे, हर बातों मे,

मेरी आखों मे, इन ख्वाबों मे,

कुछ अपनों मे, कुछ सपनो मे ,



मुझे अपनी सी लगती क्यों है तन्हाई ????



http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SeemaGupta/tanhai.htm



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