8/20/2011

The Sunday Indian Hindi” presents 111 TOP HINDI WOMEN WRITERS OF 21ST CENTURY

“The Sunday Indian Hindi” presents 111 TOP HINDI WOMEN WRITERS OF 21ST CENTURY
I am highly obliged to the Editor of the Magazine to give such prestigious space in the special edition of “THE SUNDAY INDIAN HINDI” 21ST August 2011. It is really a matter of pride to get recognisation among “111 TOP HINDI WOMEN WRITERS OF 21ST CENTURY”.


















8/06/2011

Seema Gupta on DD National



It was a wonderful experience to participate in a special programme "Open Channel" on Monady 11th July 2011 at Electronic Media production Centre of IGNU Delhi. This was a Question Answer session about contribution in literature and poetry. Which was conducted by Dr Waris Ahmad Khan Dy Director of Electronic Media production Centre of IGNU and Mr Mohammed Tariq Faizi , Secretary General URDU PRESS CLUB·
This programme was aired on DD National on 18th July at 6 am and on Gyan Darshan on 18th July at 9.30 pm .
I am highly thankful to the Dr Waris Ahmad Khan and Mr Mohammed Tariq Faizi for giving me this opportunity to be part of this programme

8/03/2011

हजारों ख्वाब आँखों में हमारी मुस्कुराये हैं



हजारों ख्वाब आँखों में हमारी मुस्कुराये हैं
तेरे मिलने की बेताबी ने क्या क्या गुल खिलाये हैं

तसव्वुर ने तेरे फिर रात भर मुझको जगाया है
तेरी चाहत ने मेरी नींद पर पहरे लगायें हैं ......

लबों पर प्यास रखी है मिलन की आस रखी है
वही यादों का दरया है वही ठंडी हवाएं हैं

ये मंज़र शाम ढलने का , ये भीगी रात का दामन
तेरी यादों ने ऐ जानम यहीं खेमे लगाये हैं

ये तन्हाई , ये खामोशी , ये 'सीमा' हिज्र के लम्हे
रुपहली चांदनी रातों में , हम खुद को जलाएं हैं

7/02/2011

"तबियत कुछ बहलने सी लगी है "



हवा पुर कैफ चलने सी लगी है
तबियत कुछ बहलने सी लगी है

नया सा ख्वाब आँखों में सजा है
पुरानी रुत बदलने सी लगी है

है उसका ज़िक्र लेकिन वो नहीं है
कमी हर वक़्त खलने सी लगी है

रखा है एक दिया चौखट पे हम ने
उम्मीद -ए -शाम ढलने सी लगी है

सुनी है चाप जब से उसकी "सीमा"
मेरी भी साँस चलने सी लगी है

5/30/2011

7TH AIPC INTERNATIONAL CONGRESS 21ST MAY TO 28TH MAY 2011 IN U.A.E






"DR. LARI AZAD, SEEMA GUPTA WITH THE HONOUR OF "MISS BEAUTY WITH BRAIN 2011" , NIRODA HANDIQUE " MISS WORLD AIPC 2011, DR. K.P SUDHIRA "MISS TRIP HETRIC 2011" with DR. SHOBHNA JAIN"







"WITH GUEST OF HONOUR MS. SHAZIA QIDWAI AT INAUGURAL SESSION 7TH AIPC INTERNATIONAL CONGRESS 22ND MAY 2011 AT HOTEL FOUR POINTS BY SHERETON,Bur Dubai "
"WITH MR. IMRAN MOJIB SENIOR REPORTER "GULF TODAY" AT INAUGURAL SESSION 7TH AIPC INTERNATIONAL CONGRESS 22ND MAY 2011 AT HOTEL FOUR POINTS BY SHERETON,Bur Dubai "









PRECEIOUS MOMENT OF RECEIVING THE HONOUR OF "MISS BEAUTY WITH BRAIN" AT ABU DHABI HOTEL RADISSON BLU,Golf Plaza, Yas Island FELICIATION CEREMONY 24TH MAY 2011 BY " PROF (DR) LARI AZAD, DR. SHOBHNA JAIN, DR. SANDHYA MERIYA, NIRODA HANDIQUE , DR ASHA GUPTA, H.C. SUJATHAMMA, DR PRABHA NERALGI

























































"RELEASE OF "HEART BEATS OF INDIA" WRITTEN BY DR. LARI AZAD AT INAUGURAL SESSION 7TH AIPC INTERNATIONAL CONGRESS 22ND MAY 2011 AT HOTEL FOUR POINTS BY SHERETON,Bur Dubai"

"RELEASE OF INTERNATIONAL MAGZINE "SAURABH" AT INAUGURAL SESSION 7TH AIPC INTERNATIONAL CONGRESS 22ND MAY 2011 AT HOTEL FOUR POINTS BY SHERETON,Bur Dubai"











http://webvarta.com/news_detail.php?cu_id=65868&news_id=2
http://visharadtimes.com/detailsnews.php?id=193

5/17/2011

BBC.co.uk "आप की पसंद " 15/5/2011 में मेरी आवाज में मेरी गजल

BBC.co.uk "आप की पसंद " 15/5/2011 में मेरी आवाज में मेरी तीन गजलों को यहाँ सुनिए

१) फिर उसी शाख पर नशेमन बनाया जाए
२) भेजता वो भी अब गुलाब नहीं
३) ख़्वाब जैसे ख्याल होते हैं


5/02/2011

"BBC.co.uk "आप की पसंद " में मेरी आवाज में मेरी नज़्म/ ग़ज़ल

"BBC.co.uk "आप की पसंद " में मेरी आवाज में मेरी नज़्म/ ग़ज़ल



आज फिर एक ख़ुशी का मौका है मेरे लिए BBC UK से प्रसारित होने वाले Musical प्रोग्राम "आप की पसंद " में मेरी में आवाज मेरी नज़्म/ ग़ज़ल को स्थान मिला है,


मेरी तीन नज़्म/ गजलो को मेरी ही आवाज में यहाँ सुनिए

1)प्यार बेपनाह करते रहे
2)मुलाकात कर लें
3)अपनी कहानी उसकी जुबानी
जिसे आप सभी इस लिंक
http://www.bbc.co.uk/iplayer/episode/p00g7z8s/Aap_Ki_Pasand_01_05_2011/ जाकर सुन सकते हैं.

The programme is for 1.57 hrs and my gazal starts from 0.57 hr.

4/26/2011

"ख्वाब जैसे ख्याल होते हैं"


ख्वाब जैसे ख्याल होते हैं
इश्क में ये कमाल होते हैं

एक नमूना हो ज़िन्दगी जिनकी
लोग वो बे मिसाल होते हैं

गम अजब हैं यहाँ सितारों के
चाँद को भी मलाल होते हैं

शब् की तनहाइयों में अक्सर ही
जलवा-गर सब ख्याल होते हैं

इश्क बर्बाद हो गया कैसे
हुस्न से ये सवाल होते हैं

उनकी फुरक़त में रात दिन "सीमा"
आजकल हम निढाल होते हैं


4/04/2011

" हवाओं के जेवर "


"हवाओं के जेवर "

मौसम के खजाने से
एक लम्हा बहारो का
दिल करता है चुरा लाऊं
बारिशों के घुंघरू
हवाओं के जेवर
शाखाओं की हंसी
फिजाओं की झालर
पगडंडियों की सांसो को
छु कर कभी देखा ही नहीं …..

3/07/2011

अश्को के घुंघरू




"अश्को के घुंघरू "

धडकनों के अनगिनत जुगनू
कहाँ सब्र से काम लेते हैं
चारो पहर खुद से उलझते हैं
तेरे ही किस्से तमाम होते हैं
लम्हा लम्हा तुझको दोहराना
यही एक काम उल्फत का
हवाओं के परो पर लिखे
इनके पैगाम होते हो
कभी बेदारियां खुद से
कभी शिकवे शिकायत भी
तेरी यादो की शबनम में
मेरे अश्को के सब घुंघरू
तबाह सुबह शाम होते हैं
धडकनों के अनगिनत जुगनू
कहाँ सब्र से काम लेते हैं

2/07/2011

"चांदनी पीती रही"


"चांदनी पीती रही"

आँखे सुराही घूंट घूंट
चांदनी पीती रही
इश्क की बदनाम रूहें
अनकहे राज जीती रही
रात रूठी बैठी रही
नाजायज ख्वाब के पलने झुला
नींद उघडे तन लिए
पैरहन खुद ही सीती रही
हसरतों के थान को
दीमक लगी हो वक़्त की
बेचैनियों के वर्क में
उम्र ऐसी बीती रही
आँखे सुराही घूंट घूंट
चांदनी पीती रही

1/24/2011

"युध्भूमि" त्रेमासिक पत्रिका का "सिसकती इंसानियत"


"युध्भूमि" त्रेमासिक पत्रिका का "सिसकती इंसानियत" का अंक मिला, किन शब्दों में आदरणीय प्रदीप जी का आभार प्रकट करूं समझ ही नहीं आ रहा. मेरी ताशकंत की यात्रा को आदरणीय शास्त्री जी की प्रतिमा और विवरण सहित जिस सुन्दरता से निखार कर युध्भूमि में अनुपम स्थान मिला है बस अभिभूत हूँ. कभी कभी कुछ कहने को शब्द भी कम पड़ जाते हैं, आज वही स्थिति मेरे सामने है.
सच में बेहद ही अनूठी प्रस्तुती है ये "युध्भूमि" , कितने सवाल कितने जवाब.....कितने संकल्प और न जाने साहित्य की कितनी सर्द गर्म आहटे समेटे अपने आप में एक सम्पूर्ण पत्रिका है.
आदरणीय सलीम प्रदीप जी और उनकी पूरी टीम को हार्दिक बधाई इतनी शानदार पेशकश पर. आप सभी का ये प्रयास अत्यंत सराहनीय है , नये पुराने साहित्य से परिचय कराने उनसे जुडी विस्तृत जानकारी देने में जो मेहनत आप लोग करते हैं अपना कीमती समय लगाकर उसके लिए शुक्रिया शब्द बेहद ही छोटा सा है. .युध्भूमि दिन बा दिन उचाईयों के नये आयाम स्थापित करे इन्ही शुभकामनाओ के साथ ..



"युध्भूमि" पत्रिका का वार्षिक शुल्क १००/- रूपये है. इस पत्रिका को यहाँ संपर्क कर के प्राप्त किया जा सकता है.
"बी-२, मानसरोवर पार्क, शाहदरा , दिल्ली -110032"
दूरभाष - 9312034120
ईमेल- yudhbhumi@gmail.com

1/22/2011

"कोई इस चाँद से पूछे"



"कोई इस चाँद से पूछे"

पहाड़ियों , घाटियों के ऊपर
बादलों की धारा में बहता
झील की
डबडबाती आँखों में तैरता
चुप सा तन्हा चाँद का टुकड़ा
सितारों की जगमगाहट ओढ़
रात और दिन के बीच का सफ़र
निरंतर तय कर रहा है
एकांत में जीना कैसा होता है
कोई इस चाँद से पूछे....

12/02/2010

"दर्द का दरिया " काव्य संग्रह विमोचन"

"दर्द का दरिया"
(काव्य संग्रह )ISBN 978-81-908201-5-8

मूल्य : 200 रुपये प्रथम संस्करण : 2010 प्रकाशक : अखिल भारतीय कवयित्री सम्मेलन
आवरण कल्पना: डॉ. लारी आज़ाद
भाषा : हिंदी और उर्दू

"अखिल भारतीय कवयित्री सम्मेलन के छठे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में 23 - 30 November 2010 को उज़्बेकिस्तान की राजधानी "ताशकंत" में मेरे दुसरे काव्य संग्रह "दर्द का दरिया" का विमोचन DR. Lari Azad जी के हाथो संपन हुआ. आज ए.आई. पी.सी के गौरवशाली आश्रय के अंतर्गत मेरे दुसरे काव्य संग्रह का दो भाषाओँ हिंदी और उर्दू में एक साथ प्रकाशित होना किसी महान उपलब्धि से कम नहीं है.





























"Woman of the East " का प्रशस्ति पत्र Prof (DR.) Lari Azad और Dr Shobhna Jain जी से प्राप्त करते हुए









“ विशेष आभार जो विरह के रंग के हमराही बने”

मेरे पहले काव्य संग्रह " विरह के रंग" को शिवना प्रकाशन के आदरणीय पंकज सुबीर जी (भाई जी ) ने जो एक रौशनी से भरी राह दिखाई उसका आभार किन शब्दों मै व्यक्त करूं कुछ भी समझ नहीं आ रहा, जो रंग, रूप, नये आयाम , नया विस्तार दिया , दुनिया मै एक पहचान दी, आज ढूंढे से आभार व्यक्त करने को शब्द नहीं मिल रहे.
आभार ब्लाग जगत के उन सभी आदरणीय साथियों का जिन्होंने "विरह के रंग" की समीक्षा अपने ब्लॉग पर की और मुझे सम्मान दिया.

" प्रकाश सिंह अर्श" , “सुरेंदर कुमार अभिन्न" , " अरविन्द मिश्र जी" , " सतीश सक्सेना जी" , " फिरदोस जी" (स्टार न्यूज़ एजिंसी), "रविरतलामी जी" और

आदरणीय पी.सी. मुद्गल जी का जिनका ब्लॉग लेखन "ताऊ रामपुरिया" के नाम से है, जिन्होंने वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता - २०१० के सभी कांस्य सम्मान विजेताओं को मेरी काव्यकृति "विरह के रंग" की एक प्रति इनाम स्वरूप भेंट की.

आभारी हूँ ब्लागजगत के सभी माननीय जनों के आशीर्वाद और प्रोत्साहन के लिए जिनके सहयोग से मेरे दुसरे काव्य संग्रह का जन्म हुआ.



http://dreamstocometrue.blogspot.com/2010/12/blog-post.html

11/15/2010

"इश्क की इबादत "




"इश्क की इबादत "

बर्फीली पहाड़ियों से उठ कर
अधखुली आँखों से झांकती
भोर की निष्पक्ष किरणों से
कुनमुनाता है ठहरा सागर
नर्म घास की अंगड़ाइयों से
महकने लगती है फिजायें
धीमी गति से चुपचाप फिर
कहीं हवाएं लेती हैं करवटें
यूँ लगता है .....
कायनात की आगोश में सिमटा
पवित्र सौंदर्य का दिलकश मंजर
लिख रहा हो
धरती के अलसाये बदन पे
इश्क की एक नई इबादत

10/27/2010

"नसीब"


"नसीब"


कुछ सितारे
मचल के जिस पहर
रात के हुस्न पे दस्तक दें
निगोड़ी चांदनी भी लजाकर
समुंदर की बाँहों में आ सिमटे
हवाओं की सर्द ओढ़नी
बिखरे दरख्तों के शानों पे
उस वक़्त तू चाँद बन
फलक की सीढ़ी से फिसल जाना
चुपके से मेरी हथेलियों पर
वो नसीब लिख जाना
जिसकी चाहत में मैंने
चंद साँसों का जखीरा
जिस्म के सन्नाटे में
छुपा रखा है ...

10/11/2010

"हथेली पे उतारा हमने"

एक खुबसूरत रूहानी से मंजर की कल्पना करते हुए, उस चाँद को जो न जाने कितनी दूर है मगर हर पल उतना ही करीब होने का एहसास करा जाता है , अगर अपने सामने आपने पास अपनी हथेलियों की कम्पन में महसूस कीया जाए तो कैसा लगता होगा ना. इस दिलनशीन पल की कल्पना को मेरे साथ यहाँ सुनिए.....


"हथेली पे उतारा हमने"

रात भर चाँद को चुपके से
हथेली पे उतारा हमने
कभी माथे पे टिकाया
कभी कंगन पे सजाया
आँचल में टांक के मौसम की तरह
अपने अक्स को संवारा हमने

रात भर चाँद को चुपके से
हथेली पे उतारा हमने
सुना उसकी तन्हाई का सबब
कही अपनी दास्तान भी
तेरे होटों की जुम्बिश की तरह
पहरों दिया सहारा हमने

रात भर चाँद को चुपके से
हथेली पे उतारा हमने
अपने अश्को से बनाके
मोहब्बत का हँसीं ताजमहल
तेरी यादों की करवटों की तरह
यूँ हीं एक टक निहारा हमने

रात भर चाँद को चुपके से
हथेली पे उतारा हमने


9/21/2010

"हाँ तुम मेरी धडकनों में महफूज रह सकती हो"

"हाँ तुम मेरी धडकनों में महफूज रह सकती हो"

"आदरणीय सलीम प्रदीप जी की पुस्तक " महबूबा से महबूब तक " तक पढने का मौका मिला , और उस पर अपने कुछ विचार व्यक्त किये, जिन्हें "युध्भूमि" के ताजा अंक " उफ़! ये मोहब्बत " में स्थान मिला, अपने इस गौरव और सम्मान को आप सभी से बाँट रही हूँ"





8/30/2010

"कभी यूँ भी हो "


"कभी यूँ भी हो "

कभी यूँ भी हो
देखूं तुम्हे ओस में भीगे हुए
रेशमी किरणों के साए तले सारी रात


चुन लूँ तुम्हारी सिहरन को
हथेलियों में थाम तुम्हारा हाथ

महसूस कर लूँ तुम्हारे होठों पे बिखरी
मोतियों की कशमश को
अपनी पलकों के आस पास

छु लूँ तुम्हारे साँसों की उष्णता
रुपहले स्वप्नों के साथ साथ

ओढ़ लूँ एहसास की मखमली चादर
जिसमे हो तुम्हरी स्निग्धता का ताप

कभी यूँ भी हो .....
देखूं तुम्हे ओस में भीगे हुए
रेशमी किरणों के साए तले सारी रात


8/02/2010

"तुम्हारा है "

" कुछ आँखों की गुफ्तगू है और उनमे सिमटे जज़्बात हैं.....
आँखे जो कायनात का नज़ारा करवाती हैं..."
मीरतकी मीर के इस शेर के साथ एक छोटी सी पुरानी कविता "तुम्हारा है" को यहाँ सुनिए.......
"मीर उन नीम बाज आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है"




"तुम्हारा है "

जो भी है वो तुम्हारा ...

यह दर्द कसक दीवानापन ...
यह रोज़ की बेचैनी उलझन ,

यह दुनिया से उकताया हुआ मन...
यह जागती आँखें रातों में,

तनहाई में मचलन और तड़पन ..........
ये आंसू और बेचैन सा तन ,

सीने की दुखन आँखों की जलन ,
विरह के गीत ग़ज़ल यह भजन,

सब कुछ तो मेरे जीने का सहारा है ........
जो भी है वो तुम्हारा है