10/13/2008

विरह का रंग




"विरह का रंग"


आँखों मे तपीश और रूह की जलन,

बोजिल आहें , खामोशी की चुभन,

सिमटी ख्वाईश , सांसों से घुटन ,

जिन्दा लाशों पे वक्त का कफ़न,

कितना सुंदर ये विरह का रंग


(विरह का क्या रंग होता है यह मैं नही जानती . लेकिन इतना ज़रूर है की यह रंग -हीन भी नही होता और यह रंग आँखें नही दिल देखता है)
http://hindivani.blogspot.com/2008/10/blog-post_23.html

48 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत ही सुन्दर भाव!!

श्रीकांत पाराशर said...

Virah ke dard ka gahra ahsas hai kavita men.

Rakesh Kaushik said...

jo upmayen di gayi hai, or jo alankaaro ka pryog huva hai vo outstanding hai. kavita ke pehle shabd se akhri shabd tak aap hume bandhne me kamyaab rahi hai.

congratulations.

Rakesh Kaushik

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सच में यही होते हैं विरह के रंग सुन्दर हैं यह लफ्ज़

Anil Pusadkar said...

विरह का रंग और उसकी सुंदरता पहली बार देख रहा हूं। अच्छा लिखा आपने।

archeav said...

Virah ka rang aankhein nahi dil dekhta he, sach kaha..
Me bhi ye kehna chahoonga ki bhale hi mere pass ankhein NA ho lekin dil zaroor he aur iss dil me thumahre liye bhut respect regard hai.

Don't know how to say, lekin kabhi kabhi insaan apne aap ko bhool jata he aur parayon ko yaad rakhta he.. I'm deeply sorry Seema!

May my time is not clicking for me.. otherwise how can somebody miss something which he keeps waiting for whole year..
This is very unfortunate for me (not for you)"belated happy b'day seema" M really sorryyyyyyy.

Archeav

mamta said...

विरह का क्या रंग होता है यह मैं नही जानती । लेकिन इतना ज़रूर है की यह रंग -हीन भी नही होता और यह रंग आँखें नही दिल देखता है ।

पूरी तरह सहमत है ।

hamen to pata nahi tha khair belated happy birthday .

जितेन्द़ भगत said...

यह बात का आयाम तो बहुत व्‍यापक है-वि‍रह से भी आगे की चीज़ इसमें बयॉं हो गई है, इन पंक्‍ति‍यों में हम सबकी पीड़ा दर्ज हे-

''जिन्दा लाशों पे वक्त का कफ़न''

फ़िरदौस ख़ान said...

जिन्दा लाशों पे वक्त का कफ़न,

कितना सुंदर ये विरह का रंग

बहुत ख़ूब...बहुत गहरी बात कम लफ़्जों में ही बयां कर दी...

ताऊ रामपुरिया said...

आज आपकी पंक्तियाँ कोट नही करूंगा ! बल्कि ये कहूंगा की जो हम सिर्फ़ सोच पाते हैं और कह नही पाते , उस ख़याल को आपने शब्द दे दिए ! लाजवाब ! आपमे विराजते कवि को प्रणाम !

विवेक सिंह said...

अति सुन्दर !

Advocate Rashmi saurana said...

bahut sundar rachana. badhai ho.

COMMON MAN said...

aapko roj roj kya tippani di jaaye, shabd nahi milte

vipinkizindagi said...

virah ke rango me aapne virah ki pida batai hai...
bahut sundar..

रंजन said...

जिन्दा लाशों पे वक्त का कफ़न,

कितना सुंदर ये विरह का रंग


बहुत खुब..

डॉ .अनुराग said...

बहुत ही सुन्दर

कुन्नू सिंह said...

बहुत बढीया है। बहुत अच्छा कविता है।

हर एक कविता का कोई जवाब नही है।

makrand said...

baut sunder rachana
regards

Birds Watching Group Ratlam (M.P.) said...

your painting brush got success to paint the drawing in words

मीत said...

अपनी आँखों ने भी देखा है ये विरह का रंग...
जिन्दा लाशों पे वक्त का कफ़न,
कितना सुंदर ये विरह का रंग

"SURE" said...

विरह के रंग जो अपने लिखे है अगर कोई विरह झेल चुका है या झेल रहा है उसको ज्यादा पता होगा ,हाँ मिलन के विपरीत जो भी है वह कम कीमती नही होता उसमे रंग इस बात का भी होता है की विरह में ही हम जयादा से ज्यादा ख्यालों में रहते है और मिलन के खवाब या पुरानी यादों में खोये रहते है ,आपने भावों का कविता में प्रस्तुत करके इन रंगों को और भी सुंदर बना दिया ...बधाई सुंदर लेखन और निराली सोच के लिए

swati said...

is rang se meri bhi sehmati....

प्रहार - महेंद्र मिश्रा said...

बहुत बढ़िया पर विरह रंग कुछ फीका होता है .

neeshoo said...

चंद पक्तियां कहती हैसब कुछ

नीरज गोस्वामी said...

बड़ा डरावना दिखाया है आप ने विरह का रंग...अच्छी और सच्ची रचना...
नीरज

ताऊ रामपुरिया said...

आँखों मे तपीश और रूह की जलन,
बोजिल आहें , खामोशी की चुभन,
सिमटी ख्वाईश , सांसों से घुटन ,
जिन्दा लाशों पे वक्त का कफ़न,
कितना सुंदर ये विरह का रंग

पहले सोचा की ये वाली लाइन अच्छी , फ़िर वो भी , ...ऐसे करते २ पुरी रचना ही बेमिसाल है ! बहुत बधाई !

Prakash singh "Arsh" said...

sundar aur saral shabdon ke mishran se bani ek utkrist rachana.......

bahot hi sundar ........ bahot badhai aapko...

regards

भूतनाथ said...

सिर्फ़ और सिर्फ़ लाजव्वाब !

सचिन मिश्रा said...

Bahut badiya.

विनय said...

विरह को क्या ख़ूब शब्दों में पेश किया है...

राज भाटिय़ा said...

भगवान किसी को भी इस विरह का अहसास भी ना कराये, एक बहुत ही दर्द भरी कविता.
राम राम जी की

dr. ashok priyaranjan said...

seemaji,
आपने बहुत अच्छा िलखा है । अापकी प्रितिक्र्या को मैने अपने ब्लाग पर िलखे नए लेख में शािमल िकया है । आप चाहें तो उसे पढकर अपनी प्रितिक्रया देकर बहस को आगे बढा सकते हैं ।

http://www.ashokvichar.blogspot.comं

makrand said...

aap to blog ke amitabh ho
chapte hi hazaroan tippania
u hi likhte rahiye
regards

प्रदीप मानोरिया said...

हमेशा की तरह बेहतरीन रचना पढ़वाने के लिए धन्यवाद मेरी नई रचना कैलंडर पढने हेतु आप सादर आमंत्रित हैं

BrijmohanShrivastava said...

इतना सुंदर बिरह का रंग =अति अति अति सुंदर /काश तपिश , बोझिल और ख्वाहिश में मुद्रण त्रुटी न हुई होती

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wah seema g wah

Anonymous said...

bus tumhare shahr ki galiyon mein dhoondta hoon kisay

नारदमुनि said...

darwaje pe khadi khadi sajni kare vichar,sawan kaise gujare ga jo nahi aaye bhartar. meri is mahila kee virah vedana fir kabhee filhal wahi bat best ka bhee best likhati hain aap.

Anonymous said...

SAFAR MEIN AB BHI AADATAN
SARAAB DEKHTA HOON MAIN,
TUMHARE SHAHR MEIN MILAN KE
KHWAAB DEKHTA HOON MAIN;

PICHLI RUT KE MAAJRAY
PHIR SE YAAD AA GAYE,
AB AKAYLI ZINDIGI
AZAAB DEKHTA HOON MAIN;

TUM AGAR KAHEEN MILAY
TO SOCHTA HOON YE SAWAAL;
TUMSE MIL KE ITNEE KYUN
PYAAS DEKHTA HOON MAIN;

ITNEE PYAAS HAI KI AB
RUK SAKAY NAHEEN KADAM,
BADH CHALAY UDHAR JIDHAR
SARAAB DEKHTA HOON MAIN;

SAB TO JAL KE RAAKH HAI
DIL BAHUT UDAAS HAI,
AB MILAN KI TUJH SE KYUN
AAS DEKHTA HOON MAIN;

SARAAB DEKHTA HOON MAIN


(SARAAB=MRIGTRSHNA)

पंकज सुबीर said...

seema ji number bhej raha hoon
Account number : 30010100000029
Name : pankaj purohit subeer
Branch : sehore Madhya Pradesh
कृपया अपना पूरा पता तथा मोबाइल नंबर तथा ईमेल आइडी भी मेल करें । आपका मेल आइडी नहीं होने के कारण आपके ब्‍लाग पर ही कमेंट
पंकज सुबीर

ilesh said...

khubsurat ehsas

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

जिन्दा लाशों पे वक्त का कफ़न,
कितना सुंदर ये विरह का रंग ।

इन दो पंक्तियों में आपने बहुत कुछ कह दिया है। बधाई।

डा. फीरोज़ अहमद said...

Wah seema gi wah

Mumukshh Ki Rachanain said...

वाह!
बहुत खूब!!

चन्द्र मोहन गुप्त

yamaraaj said...

हम तेरे तसव्वुर में दिन रात ही रहते हैं,
कातिल है अदाएं तेरी कातिल ये अंगडाई है..
बहुत खूब........

bhoothnath said...

bap re baap!!kya kahun? shabd hi nahin bache mere paas

bavaal said...

Seemajee aap vakeyee laajavab ho. Bahut bahut khoob. Kya kahna is andaaj ka !

bhoothnath said...

वक्त को दोष क्यूँ दें अगरचे हम ख़ुद इक जिन्दा लाश हैं..... अच्छे भावों की अच्छी अभिव्यक्ति !!