7/06/2009

"तेरे जाने के बाद"

s"तेरे जाने के बाद"

आँखों मे जलजले ,
मरुस्थल दिल की जमीन .
भावनाओ की साजिश ,
संभावनाओ का जलना .
धधकते अंगारों से पल,
दर्द का विकराल रूप ,
म्रत्यु से द्वंद ,
पथराये जिस्म का गलना .
तेरे जाने के बाद......

http://latestswargvibha.blog.co.in/

6/22/2009

"मौन जब मुखरित हुआ "

"मौन जब मुखरित हुआ "

मौन जब मुखरित हुआ
और सुर मे आने लगा,
प्रियतम तेरी यादो का झरना
फुट फुट जाने लगा..

भूली बिसरी बातो के
सोए खंडहर सहसा जाग उठे,
पीडा के बोझ से दबा
हर पल लडखडाने लगा...

बिखरे हुए संबंधो की कडियाँ
छोर भी न कोई पा सकी,
अपनत्व का अस्तित्व
दर दर ठोकरे खाने लगा...
नैनो की शाखों पे
जम गये जो सुख कर
मृत अश्को मे प्राण
जैसे अंकुरित हो जाने लगा...

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6/09/2009

"अपनों का साया "

" आज फिर आप सब के बीच अपने को देख पाना बडा ही सुखद एहसास है. आदरणीय ताऊ जी और अरविन्द मिश्र जी की दिल से आभारी हूँ जिन्होंने मेरी अस्वस्थता को अपने ब्लॉग पर स्थान देकर मेरे लिए इस ब्लॉग परिवार के हर सदस्य से मंगल कामनाओ का एक वीशाल भंडार अर्जित किया. उन्ही दुआओं और शुभकामनाओ का असर है की अब मै कुछ हद तक ठीक होकर फिर अपने इस ब्लॉग परिवार मे आप सब के साथ अपने को देख पा रही हूँ. हैरान हूँ इतना अपनापन और स्नेह पाकर इतने बडे ब्लॉग परिवार से...लगा ही नहीं की लगभग एक महीने से ब्लॉग से दूर हूँ.....कितने ही ब्लॉग के वरिष्ट सदस्य ईमेल, फ़ोन , और अपनी टिप्पणीयों के द्वारा मुझ से मेरे इस कठिन समय मे जुड़े रहे और अपनेपन का एहसास दिलाते रहे. आप सब के हर शब्द , हर दुआ, हर शुभकामनाओ की दिल से आभारी हूँ. उम्मीद है आने वाले और दो चार दिनों मे ब्लॉग पर नियमित हो जाउंगी. इस ब्लॉग परिवार का शुक्रिया कहना बहुत छोटा शब्द है .....ये कुछ पंक्तियाँ आप सब के लिए आभार सहित..."

"अपनों का साया "

जीवन मे अब क्या मै मांगु,
बिन मांगे सब कुछ पाया है,
एकांत रहे जब कुछ दिन मेरे,
इर्द गिर्द देखा अपनों का साया है...

आभारी हूँ मै हर उस दिल की,
कठिन समय में जिसने साथ नीभाया है
स्नेह आशीष और दुआओ का ...
वीशाल भंडार मुझ पर बरसाया है...

कोई जान नहीं पहचान नहीं,
सबसे मिलने के आसार नहीं..
मंगल कामनाओ मे मगर...
सबने एक जुट होकर शीश नवाया है ...

एकांत रहे जब कुछ दिन मेरे,
इर्द गिर्द देखा अपनों का साया है...

(With Regards)

5/11/2009

तड़पने की दरखास्त

"तड़पने की दरखास्त"

कागज की सतह पर बैठ
लफ्जो ने जज्बात से
तड़पने की दरखास्त की है

विचलित मन ने बेबस हो
प्रतीक्षा की बिखरी
किरचों को समेट

बीते लम्हों से कुछ बात की है..
यादो के गलियारे से निकल
ख्वाइशों के अधूरे प्रतिबिम्बों ने
रुसवा हो उपहास की बरसात की है

धुली शाम के सौन्दर्य को
दरकिनार कर उड़ते धुल के
चंचल गुब्बार ने दायरों को लाँघ
दिन मे ही रात की है


http://swargvibha.0fees.net/july2009/Kavita/tarapne%20ki.html

5/02/2009

"आदि ”



आदित्य रंजन (आदि ) के पहले जन्म दिवस पर असीम स्नेह प्यार , आशीर्वाद और ढेरो दुआओं के साथ ये कुछ पंक्तियाँ आज आदि के नाम....

"आदि ”

हम सब की दुआओं का आदि
तुम कुछ ऐसे फल पाना
इश्वर के हर आशीर्वाद का
तुएक हिस्सा बन जाना

थाम के ऊँगली बाबा की
और माँ के आंचल की छाया में
नन्हे नन्हे पग रख कर
जीवन पथ पर आगे बढ़ते जाना

कोई कष्ट तुम्हे ना छु पाए
कोई आंच भी तुम पर ना आये
खुशियों के मोती बिखरे हो
जिस दिशा में भी तुम मुड जाना

ये स्नेह प्यार और आशीर्वाद
तुम पर सबने बरसाया है
एक भोली मुस्कान से तुम
यूँही सब के दिल को भरमाना

हर कामना इच्छा और लक्ष्य
सब पुर्ण तुम्हारे हो जाये
देव मंदिर में आरती की
बस प्रार्थना तुम बन जाना

(स्नेह सहित)

4/27/2009

"बारिशों ने घर बना लिए "

"बारिशों ने घर बना लिए "


यादे तेरी अश्रुविहल हो
असहाय कर गई
आँखों मे कितनी
बारिशों ने घर बना लिए

गूंजने लगा ये मौन
तुझको पुकारने लगा
व्यथित हो सन्नाटे ने भी
सुर से सुर मिला लिए

बिखरने लगे क्षण प्रतीक्षा के
अधैर्य हो गये
टूटती सांसो ने
दुआओं मे तेरे ही
हर्फ सजा लिए ............

http://swargvibha.0fees.net/june2009/Kavita/barish%20ko.htm

4/20/2009

निरुत्तर लौटे संदेश सभी

" निरुत्तर लौटे संदेश सभी "

सुनी लगती है ये धरती...
अगन ये नभ बरसाता है
तुमको खोजे कण कण मे
ये मन उद्वेलित हो जाता है...

अरमानो के पंख लगा
एक स्पर्श तुम्हारा पाने कों
सेंध लगा रस्मो की दीवारों मे
दिल बैरागी हो जाता है.....
हर आस सुलगने लगती है
उम्मीद बोराई जाती है
ये कसक है या दीवानापन
सुध बुध को समझ ना आता है...

पानी की बूंदों से बाँचे
और पवन के रुख पे सजों डाले
निरुत्तर लौटे वो संदेश सभी
हर प्रयास विफल हो जाता है...