8/11/2017

"तिश्नगी"

"TISHNAGI" ( NAZM )
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Jaanti huN aaj phir
Haar jayegi mere dil ki awaaz
Aur uski wajeh hogi meri chup
Aur tum phir rahoge khaamosh
Hamesha ki tareh
Thumahri is khaamoshi ke aage
Dekh paa rahi hoon
Thumahre andar bhi
Is pal kuchh naa keh paane ki kasak
Mom ban pighalne lagi hai
Jis ki dhimi dhimi 
Aanch se sulagne lagi hai
Mere Bhitar tumheN naa sun paane ki tishnagi
Is Aah ke sath
Meri chup tumahri khamoshi ke sath
Kuch lamhoN ka safar 
Kai sadiyan ban tay kreNge
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"तिश्नगी"
जानती हूँ आज फिर 
हार जायेगी मेरे दिल की आवाज़
और उसकी वजह होगी मेरी चुप
और तुम फिर रहोगे ख़ामोश 
हमेशा की तरह
तुम्हारी इस ख़ामोशी के आगे
देख पा रही हूँ 
तुम्हारे अंदर भी 
इस पल कुछ ना कह पाने की कसक
मोम बन पिघलने लगी है 
जिस की धीमी धीमी
आँच से सुलगने लगी है
मेरे भीतर तुम्हें ना सुन पाने की तिश्नगी
इस आह के साथ
मेरी चुप  तुम्हारी ख़ामोशी के साथ
कुछ लम्हों का सफ़र
कई सदियां बन तय करेंगे

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (12-08-2017) को "'धान खेत में लहराते" " (चर्चा अंक 2694) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'