10/01/2008

'दो फूल'


'दो फूल'

मेरी कब्र पे दो फूल रोज आकर चढाते हैं वो,
हाय , इस कदर क्यों मुझे तडपाते हैं वो.
मेरे हाथों को छुना भी मुनासिब न समझा,
आज मेरी मजार से लिपट के आंसू बहाते हैं वो.
हाले यार समझ ना सके अब तलक जिनका,
मेरे दिल पे सर रख कर हाले दिल सुनाते हैं वो.
जिक्र चलता है जब जब मोहब्बत का जमाने मे,
मेरा नाम अपने लब पर लाकर बुदबुदाते हैं वो.
मुझसे मिलने मे बदनामी का डर था जिनको,
छोड़ कर हया मेरी कब्र पे दौडे चले आतें हैं वो.
उनके गम का सबब कोई जो पूछे उनसे ,
दुनिया को मुझे अपना आशिक बतातें हैं वो,
कहे जो उनसे कोई पहने शादी का जोडा वो,
मेरी मिट्टी से मांग अपनी सजाते है वो.
मेरी कब्र पे दो फूल रोज आकर चढाते हैं वो,
हाय , इस कदर क्यों मुझे तडपते हैं वो

30 comments:

Rakesh Kaushik said...

Ek ajeeb si tadap ko jo aapne bhavnatmak jama pehnaya hai vo kabile tareef hai. jite ji na milne ki tadap ko marne ke baad badle mehboob ka hal-e-dil btane me aapka koi jwab nahi.

"Lady Galib" u r unreachable for me.
fantastic.

Rakesh Kaushik

रंजना [रंजू भाटिया] said...

जिक्र चलता है जब जब मोहब्बत का जमाने मे,
मेरा नाम अपने लब पर लाकर बुदबुदाते हैं वो.

बहुत सुंदर .बहुत खूब लगी आपकी यह रचना

मीत said...

मुझसे मिलने मे बदनामी का डर था जिनको,
छोड़ कर हया मेरी कब्र पे दौडे चले आतें हैं वो.
very nice...

ताऊ रामपुरिया said...

मेरी कब्र पे दो फूल रोज आकर चढाते हैं वो,
हाय , इस कदर क्यों मुझे तडपते हैं वो

लाजवाब ! शुभकामनाएं !

भूतनाथ said...

मेरे हाथों को छुना भी मुनासिब न समझा,
आज मेरी मजार से लिपट के आंसू बहाते हैं वो.

बहुत खूब ! जमाने का दस्तूर ही ये है ?

दीपक "तिवारी साहब" said...

उनके गम का सबब कोई जो पूछे उनसे ,
दुनिया को मुझे अपना आशिक बतातें हैं वो,

कमाल है ? अति सुंदर !

COMMON MAN said...

bahut khoob

मोहन वशिष्‍ठ said...

मेरे हाथों को छुना भी मुनासिब न समझा,
आज मेरी मजार से लिपट के आंसू बहाते हैं वो.
गजब की रचना है सीमा जी अति सुंदर

Rakesh said...

awesome yaar....this is the finest one...i can feel it...

MANVINDER BHIMBER said...

मेरी कब्र पे दो फूल रोज आकर चढाते हैं वो,
हाय , इस कदर क्यों मुझे तडपाते हैं वो.
मेरे हाथों को छुना भी मुनासिब न समझा,
आज मेरी मजार से लिपट के आंसू बहाते हैं वो.
हाले यार समझ ना सके अब तलक जिनका,
गजब की रचना है...लाजवाब !

vipinkizindagi said...

मुझसे मिलने मे बदनामी का डर था जिनको,
छोड़ कर हया मेरी कब्र पे दौडे चले आतें हैं वो.


bahut achchi rachna hai.....

धीरेन्द्र किशोर said...

“है यह नेक-दिली उनकी, जो मैय्यत पर आ गए
तुर्बत पर गुल चढा कर, चार आंसू बहा गए”

what more one could said.

मेरे हाथों को छुना भी मुनासिब न समझा,
आज मेरी मजार से लिपट के आंसू बहाते हैं वो.
हाले यार समझ ना सके अब तलक जिनका,
मेरे दिल पे सर रख कर हाले दिल सुनाते हैं वो.

Mask of humankind is unmasked through your rendition. Congrats!

G M Rajesh said...

जिक्र चलता है जब जब मोहब्बत का जमाने मे,
मेरा नाम अपने लब पर लाकर बुदबुदाते हैं वो.

kabr se nikal, batao unhe
jhoth badha chadha kar bakhante hain jo

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

किसी दुख की ख़ामुशी को जैसे शब्द ढूँढ़ रहे हैं...

Arvind Mishra said...

कहे जो उनसे कोई पहने शादी का जोडा वो,
मेरी मिट्टी से मांग अपनी सजाते है वो.
बहूत खूब ! क्या अंदाजे बयाँ है !

Prakash singh "Arsh" said...

उनके गम का सबब कोई जो पूछे उनसे ,
दुनिया को मुझे अपना आशिक बतातें हैं वो,

seema ji ye to dastur hai jamane ka jo dusare pe tohamat lagate hai... sundar rachna ke liye dhero badhai...



regards

"SURE" said...

again a dhamaka....
ek ek shair prabhavkari hai....
plz amend the word "tadpate" to "tadpaate" in the bottom line.

योगेन्द्र मौदगिल said...

सीमा जी,
आपकी इस काव्याभिव्यक्ति ने दुखती रग छेड़ दी..
कामयाब कविता...
बधाई....

Udan Tashtari said...

बहुत सुंदर .बहुत खूब !

श्रद्धा जैन said...

ranjish hi sahi dil bhi dukhane ke liye aa
aa phir mujhe chor ke jane ke liye aa

kuch is tarah ke dard se guzar chuke hai log
aapki gazal ne dard ke saaz chere hain

भवेश झा said...

bahot hi sundar chitran,dhnyabad

राज भाटिय़ा said...

मुझसे मिलने मे बदनामी का डर था जिनको,
छोड़ कर हया मेरी कब्र पे दौडे चले आतें हैं वो.

भई घण्ण सुथरा लिख्या हे थम ने( आप हरियाणवी हे इस लिये )
धन्यवाद

BrijmohanShrivastava said...

रचना बहुत भावुक कब्र पर फूल चढाना ,आंसू बहाना ,नाम बुदबुदाना किंतु "कहे जो उनसे कोई पहने ..........अपनी सजाते हैं वो ""पर में आकर अटक गया ,बुद्धि में भावार्थ प्रविष्ट नही हो पाया खैर रचना अच्छी है

भवेश झा said...

मेरी कब्र पे दो फूल रोज आकर चढाते हैं वो,
हाय , इस कदर क्यों मुझे तडपाते हैं वो.
मेरे हाथों को छुना भी मुनासिब न समझा,
आज मेरी मजार से लिपट के आंसू बहाते हैं वो.
gajab ki shaili hai, dhnyabad,

Mumukshh Ki Rachanain said...

सीमा जी,

आज के आर्थिक युग के इंसानों के चहरे से तो आपने नकाब ही उतार दी. बधाई स्वीकार करें.
निम्न दो पंक्तियाँ मुझे बेहद पसंद आयीं..........

मेरे हाथों को छुना भी मुनासिब न समझा,
आज मेरी मजार से लिपट के आंसू बहाते हैं वो.

चन्द्र मोहन गुप्त
www.cmgupta.blogspot.com

bavaal said...

शायद जगह नसीब हो, उस गुल के हार में !
(क्योंके) मैं फूल बनके आऊंगा, अबके बहार में !!
आदरणीय सीमाजी बहुत ख़ूब ! क्या कहना है !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत सुंदर, मानो मेरे मुंह से शब्द ही छीन लिए हों. शुभकामनाएं!

Irshad said...

बात आम है लेकिन कहने का तरिका आपका अपना और बहुत नया है। शानदार प्रस्तुति।

mukesh said...

bahut kuhb likha hai seema ji, jindgi main kabhi - kabhi esa hota hain ki jite ji to koi pyar nhi kar pata lekin marne ke baad itna pyar karte hai ki kuhd murda bhi fafak padta hai or yahi kehta hai.

realy is to good

very nice keep it up

bhoothnath said...

अत्यधिक भावावेश ...थोडी हलकी ....अन्यथा ना लें !!