11/10/2008

"खामोश सी रात"





"खामोश सी रात"

सांवली कुछ खामोश सी रात,
सन्नाटे की चादर मे लिपटी,
उनींदी आँखों मे कुछ साये लिए,
ये कैसी शिरकत किए चली जाती है....
बिखरे पलों की सरगोशियाँ ,
तनहाई मे एक शोर की तरह,
करवट करवट दर्द दिए चली जाती है....
कुछ अधूरे लफ्जों की किरचें,
सूखे अधरों पे मचल कर,
लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है...
सांवली कुछ खामोश सी रात अक्सर...


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http://rachanakar.blogspot.com/2008/11/blog-post_25.html

34 comments:

अमिताभ भूषण "अनहद" said...

लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है...
सांवली कुछ खामोश सी रात .बहुत तल्ख़ बयान है .अच्छा है .

mehek said...

lahu ko bhi sard kiye jyati hai,waah bahut sundar

अल्पना वर्मा said...

कुछ अधूरे लफ्जों की किरचें,
सूखे अधरों पे मचल कर,
लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है..

kya baat hai Seema ji--bahut hi achcha likha hai --tasveer bol uthi ho jaisey...

Rakesh Kaushik said...

kafi gehri imaginations hai. kafi behtar bani hai. i hope u really caught ur line al along.

जितेन्द़ भगत said...

एक-एक पंक्‍ति‍यॉं शानदार।

Rakesh said...

As always , marvelous.....

ताऊ रामपुरिया said...

करवट करवट दर्द दिए चली जाती है...
गहरी किंतु शालीन अभिव्यक्ति ! शुभकामनाएं !

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...शुभकामनाएं...

'sakhi' 'faiyaz'allahabadi said...

Seema,
tanha simti udaas si raat
kitni dard bhari har baat
zakhmon se koi choor ho jaise
ghum ke dariya bahe hon saath
kankar patthar kaante ghum ke
zakhm-e-dil par naye aaghaat
shaayed tum ko kuch bahlaa de
pyaar ki cchoti see saoghaat
tum ko padh kar dukh jhela hai
qubool karo mere jazbaat

Thanks

मीत said...

सूखे अधरों पे मचल कर,
लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है...
सांवली कुछ खामोश सी रात अक्सर...

गौतम राजरिशी said...

अच्छा लगा पढ़ कर...

COMMON MAN said...

अब इस आह के लिये वाह ही लिख सकता हू.

makrand said...

लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है...
सांवली कुछ खामोश सी रात अक्सर...

u got terrific sense to commnad the words which flows like river from the mountain
regards

कुन्नू सिंह said...

बहुत बढीया कविता।

आपकी हर कविता बढीया होती है।

भूतनाथ said...

सुंदर अति सुंदर रचना !

Udan Tashtari said...

बिखरे पलों की सरगोशियाँ ,
तनहाई मे एक शोर की तरह,
करवट करवट दर्द दिए चली जाती है....


-क्या बात है, सुन्दर!

पुनीत ओमर said...

"सूखे अधरों पे मचल कर,
लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है."
एकदम जीवन से हो उठे आपके भावः इन दो पंक्तियों में..
अच्छी रचना

गजेन्द्र बिष्ट said...

सीमा जी आप की रचनाशक्ति बहुत अद्भुत है. बीच में चित्रों का संगम उसमें चार चाँद लगा देता है .

"अर्श" said...

सांवली कुछ खामोश सी रात,
सन्नाटे की चादर मे लिपटी,
उनींदी आँखों मे कुछ साये लिए,
ये कैसी शिरकत किए चली जाती है....
बहोत ही मासूमियत भरी रचना,साथ में मेहसुसियत भी लिए है..
आपको ढेरो बधाई सीमा जी .

महावीर said...

वाह!
सूखे अधरों पे मचल कर,
लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है...
सांवली कुछ खामोश सी रात अक्सर...
बड़ी सशक्त रचना है।

सचिन मिश्रा said...

Bahut badiya.

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

शानदार....बधाई सीमा जी .

bhoothnath said...

और भी तनहा कर जाती है तनहा-तनहा बहती रात ....
चुपके-चुपके पैर दबाकर जाती है ये आती रात......
अक्सर आकर खा जाती है ख्वाबों को भी काली रात
गम रोये तो आँचल देकर मुझे सुलाती प्यारी रात....
प्यारा सपना आते ही दूर चली जाती सारी रात....
आँखों को मूँद लेता हूँ आखों में भर जाती रात....
शाम गए जब घर लौटूं तो जख्मों को सहलाती रात....
मुझसे तो अक्सर ही प्यारी बातें करती रात....
कुछ मुझसे सुनती है, कुछ अपनी भी सुनाती रात.....

अनुपम अग्रवाल said...

"खामोश सी रात"

सांवली कुछ खामोश सी रात,
सन्नाटे की चादर मे लिपटी,
उनींदी आँखों मे कुछ साये लिए,
ये कैसी शिरकत किए चली जाती है....
बिखरे पलों की सरगोशियाँ ,
तनहाई मे एक शोर की तरह,
करवट करवट दर्द दिए चली जाती है....
कुछ अधूरे लफ्जों की किरचें,
सूखे अधरों पे मचल कर,
लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है...
सांवली कुछ खामोश सी रात अक्सर
किस कदर तन्हाई में
लफ्जों का इंतज़ार करते हुए
तुमको क्यूँ बेदर्द किए चली जाती है ....
खामोश सी रात अक्सर

बवाल said...

Saanvlee see kuchh khaamosh see raat. Kitni behtareen peshkash hai aapkee aadarNeey Seemaajee. Kya kahna ! Aha !

राज भाटिय़ा said...

घणी चोखी शे आप की कविता,
बहुत ही ्सुंदर कविता धन्यवाद

dr. ashok priyaranjan said...

बहुत प्रखर अिभव्यिक्त । जीवन की िस्थितयों का यथाथॆ शब्दांकन । अच्छा िलखा है आपने ।

http://www.ashokvichar.blogspot.com

seema gupta said...

" aap sbhee kaa bhut bhut shukriya"

Regards

विनय said...

बहुत बढ़िया लिख रही हैं आज कल शब्द संयोजन बहुत सटीक रहा है, तारीफ़ के लिए 'वाह' शब्द भी छोटा रहेगा इस बार!

Er. Avinash Pandey said...

nice one mam, very good work
regards

संदीप शर्मा Sandeep sharma said...

कुछ अधूरे लफ्जों की किरचें,
सूखे अधरों पे मचल कर,
लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है...
सांवली कुछ खामोश सी रात अक्सर...


कुछ भी नहीं कह सकता सीमा जी,
बस यूँ ही लिखती रहिये....

मोहन वशिष्‍ठ said...

कुछ अधूरे लफ्जों की किरचें,
सूखे अधरों पे मचल कर,
लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है...
सांवली कुछ खामोश सी रात अक्सर...

very nice seema ji keep it up

"SURE" said...

कुछ अधूरे लफ्जों की किरचें,
सूखे अधरों पे मचल कर,
लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है.


दिल से लिखा और दिल से सराहा गया है

mukesh said...

lahu ko bhi sard kiye jati hai



wah bahut kuhb seema ji




accha laga padh kar