7/30/2008

"क्यों है"








"क्यों है"
तेरे बगेर तनहा जिन्दगी मे मेरी कुछ कमी सी क्यों है ,
तेरी हर बात मेरे जज्बात से आज फ़िर उलझी सी क्यों है...

तु मुझे याद ना आए ऐसा एक पल भी नही संवारा मैंने,
गुजरते इन पलों मे मगर आज फ़िर बेकली सी क्यों सी है......

बेबसी के लम्हों मे आंसुओं का वो मंजर गुजारा मैंने ,
उठती गिरती पलकों मे मगर आज फ़िर कुछ नमी सी क्यों है.........
मोहब्बत मे तेरा नाम लेकर तेरी बेरुखी को भी रुतबा दिया मैंने
हर आहट पे तेरे आने की उम्मीद फ़िर बंधी सी क्यों है.....

गिला तुझसे नही बेवफा सिर्फ़ अपनी मज्बुरीयों से किया मैंने,
वक्त से करके तकरार सांसों की रफ्तार्र

"फ़िर थमी सी क्यों है......"


12 comments:

Krishan lal "krishan" said...

Achhi ghazal seedhe saade shabdo me . Yahi kuubi hume aap ke blog par achhii lagi. aapkii pichhli kaaphi ghazal kavitaaye paDh daali Aapka bhaav paksh kaphi achha hai

Anonymous said...

bahut hi acchi lagi aapki ye rachna bhi, lagta hai aapko no. (1) ka khitab de hi dena chhiye.

Mukesh garg

Ravi said...

उठती गिरती पलकों मे मगर आज फ़िर कुछ नमी सी क्यों है.........

as an opportunity i saw your this creations. In real sense, I have no words to comments that you have written with just a good sense of literature and you used your words where they should be used.
Really i like it and desirous to get your all new creations.
...Ravi
http://mere-khwabon-me.blogspot.com/
http://ravi-yadein.blogspot.com/

Amit verma said...

Maasha Allah!

Dard se labrez ek aur Kavita..
Dard, Ruswai, Berukhi, Akelapan, Kashmakash, Aansoon aur "Zindgi se bhi bada sa mehsoos hota Intezaar".....

Sab kuch to he in panktiyon me bassss kabhi kabhi wo kushi ki ek kami si mehsoos hoti he..

Yet Again Demanding Fan Of Yours

Sanjeet Tripathi said...

खूब!
उठती गिरती किसी की पलकों पर
देखा था हमने मोती एक अटका हुआ सा,
लगा ख्वाब है कोई सहमा हुआ सा,
कहें क्या ए संजीत
सुबह का तारा टूटा न टूटा
पर वो सुहाना भरम तो टूटा।

Udan Tashtari said...

एक बार फिर दिल के टुकडे कर जायेगी
आ जायेगी जब याद पुरानी सुनता हूँ;

--वाह जी वाह!! बहुत उम्दा. आनन्द आया.

मोहन वशिष्‍ठ said...

गिला तुझसे नही बेवफा सिर्फ़ अपनी मज्बुरीयों से किया मैंने,
वक्त से करके तकरार सांसों की रफ्तार्र


"फ़िर थमी सी क्यों है......"


वाह जी वाह अति सुंदर

Ila said...

अति सुन्दर गज़ल, सीधे सादे लफ़्ज़ों में बयां की हुई.

advocate rashmi saurana said...

ek aur sundar rachana. badhai ho.
aur bhi sundar rachanaye karne ke liye meri shubhakamnaye.

'sakhi' 'faiyaz'allahabadi said...

Seema ji, Seema ji, Seema ji,
Mehroomiat ka ,udasi ka, tadpne ka , tarasney ka ek mahol bana diya aap ney dil ke dard ko kaaghaz par bikher kar.
kaun naheen mehsoos karega is dard ko jab aap itnay shakti shaali prabhavpoorn dahng se is dard ko apnee lekhni se bhasha aur apnee sunder komal pakad se bhavnaon ko chitron dwara abhivyakti de daingee.aap prashansa ki patra hain apni is anokhi prastuti ke liye ........sunder aur probhavpoorn prastuti. jab koi tadpayga aur usay kahnay ke liye shabd nahee milaynge to aap ke paas se lay jayega.

dekhiye apne mujhe bhi apni aap biti kahne ki himmat de di:

तुझ को पाने की तमन्ना थी तो तू सामने है
फिर भी पा जाने की एक दिल को लगी सी क्यूँ है.......
बेक़रारी है तड़प है तेरे मिल जाने की
जिंदिगी आके किसी राह रुकी सी क्यूँ है..........................
तेज़ रफ्तार हैं सांसें और लहू में गर्मी
फिर भी यूँ वक्त पे एक बर्फ जमी सी क्यूँ है........................
पोंछ डाले थे मुहब्बत ने वो आंसू सारे
फिर भी आंखों में तेरी आज नमी सी क्यूँ है..........
आ भी जा तेरे बिना जीना है दुशवार बहुत
तेरी हाँ हाँ है सनम एक नहीं सी क्यूँ है.........................


......aap ka..............shubhchintak

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

हाले-दिल का बयान और ख़ूबसूरत अन्दाज़!

"SURE" said...

क्यों है क्यों है क्यों है क्यों है ?
क्यों है क्यों है क्यों है क्यों है?
तेरे संग ही मेरा महत्व क्यों है ?
बता मुझे ये अपनत्व क्यों है?
निर्मोही जब तू रूठा है फिर
फिर मेरा अस्तित्व क्यों है
क्यों है क्यों है क्यों है क्यों है
क्यों है क्यों है क्यों है क्यों है