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8/02/2008

"अच्छा था"










"अच्छा था"

तेरी यादों में जल जाते तो अच्छा था,
शबनम की तरह पिघल जाते तो अच्छा था.

इन उजालों में मिले हैं वो दर्द गहरे,
हम अंधेरों में बदल जाते तो अच्छा था.

मेरी परछाईं से भी था शिकवा उनको,
ये चेहरे ही बदल जाते तो अच्छा था.

क्यों माँगा था तुझे उमर भर के लिए,
अपना ही सहारा बन जाते तो अच्छा था.

यूं बरसा के भी सावन प्यासा ही रहा,
हम ही समुंदर बन जाते तो अच्छा था.

क्यों संभाला था ख़ुद को एक मुकाम के लिए,
हम यूं ही टूट के बिखर जाते तो अच्छा था.

चाँद और सितारे तो नहीं मांगे थे हमने,
काश अपने भी मुकद्दर सँवर जाते तो अच्छा था

7/08/2008

मृगतृष्णा





कैसी ये मृगतृष्णा मेरी
ढूँढ़ा तुमको तकदीरों में
चन्दा की सब तहरीरों में
हाथों की धुँधली लकीरों में
मौजूद हो तुम मौजूद हो तुम
इन आखों की तस्वीरों में


कैसी ये ......................

अम्बर के झिलमिल तारों में
सावन में रिमझिम फुहारों में
लहरो के उजले किनारों में
तुमको पाया तुमको पाया
प्रेम-विरह अश्रुधारों मे

कैसी ये.........................

ढूँढ़ा तुमको दिन रातो में
ख्वाबों ख्यालों जज्बातों में
उलझे से कुछ सवालातों में
बसते हो तुम बसते हो तुम
साँसों की लय में बातों में
कैसी ये..........................

ढूँढी सब खमोश अदायें
गुमसुम खोयी खोयी सदायें
बोझिल साँसें गर्म हवायें
मुझे दिखे तुम मुझे दिखे तुम
हर्फ बने जब उठी दुआऐं

कैसी ये मृगतृष्णा मेरी

कैसी ये.....................

3/31/2008

"बिजली"







खो ना दूँ तुझको इस डर से तुझे कभी मैं पा न सका ,
चाहता रहा शीद्त्त से मगर तुझे कभी जता ना सका.

वीरान आँखों के समुंदर मे अपने आंसुओं को पीता रहा ,
दिल के दर्द की एक झलक भी मगर तुझे दिखा ना सका .

तेरा ख्याल बन कर बिजली और एक तूफान मुझे सताता रहा ,
इश्क मे जलने का सबब मगर तुझे कभी समझा ना सका .

तू बदनाम न हो जाए , मैं जमाने मे गुमनाम सा जीता रहा
लबों पे नाम तो था पर आवाज देकर तुझे बुला ना सका .

तु कभी गैर की न हो जाए ये ख्याल हर पल मुझे डराता रहा
शिकवा आज भी है इस डर से तुझे कभी अपना भी ना सका

उपर वाला बस बेदर्द हो गम की "बिजली" मुझपे ही गीराता रहा,
तुझसे जुदा होके भी अपना आशियाँ झुलसने से मैं बचा ना सका ……-

सीमा गुप्ता
http://vangmaypatrika.blogspot.com/2008/09/blog-post_12.html