3/16/2009

"वादों के पुष्प"

"वादों के पुष्प"

बिखेरता रहा वादों के पुष्प वो
मै आँचल यकीन का बिछाये
उन्हें समेटती रही....

अपने स्पर्श की नमी से वो
उन पुष्पों को जिलाता रहा
मै मासूम शिशु की तरह
उन्हें सहेजती रही......

हवाओं को रंगता रहा वो

इन्द्रधनुषी ख्वाबो की तुलिका से
मै बंद पलकों मे
उन्हें बिखेरती रही ....

आज सभी वादों का वजूद
अपना आस्तित्व खोने लगा .......
मै अवाक टूटते मिटते हुए
उन्हें देखती रही........

http://swargvibha.0fees.net/july2009/Kavita/seema%20gupta.html

43 comments:

P.N. Subramanian said...

मै अवाक टूटते मिटते हुए
उन्हें देखती रही........
बहुत सुन्दर रचना. आभार.

अल्पना वर्मा said...

'........मासूम शिशु की तरह

उन्हें सहेजती रही...... '

bahut hi khubsurat
bhaav-abhivyakti hai.

Sundar rachna hai Seema ji.

Udan Tashtari said...

आज सभी वादों का वजूद

अपना आस्तित्व खोने लगा .......
मै अवाक टूटते मिटते हुए

उन्हें देखती रही........

--वाकई एक मासूम अभिव्यक्ति--बेहतरीन!!

neeshoo said...

आज सभी वादों का वजूद
अपना आस्तित्व खोने लगा .......
मै अवाक टूटते मिटते हुए
उन्हें देखती रही........

bahut khub . sundar bhav . badahi

Mumukshh Ki Rachanain said...

सीमा जी,
होली की मौज मस्ती के बाद हर किसी ब्लोगर के शेर, ग़ज़ल, कवितायेँ सत्य के इतने करीब क्यों पहुँच गई? आप भी समय के साथ महसूस होने वाले सत्य को ही शब्द दे ही उठी............

आज सभी वादों का वजूद

अपना आस्तित्व खोने लगा .......

पूर्ण कविता जिन्दगी के सच को ही उजागर कर रही है.
सुन्दर, सत्य प्रस्तुति पर नमन.

चन्द्र मोहन गुप्त

mehek said...

shishu wali lines waah,sunder bhav,sunder rachana.

गौतम राजरिशी said...

"मै आँचल यकीन का बिछाये..." ये शब्द कई बार लगता है जैसे गुलाम हों आपके। मन में उमड़ते कुछ को एकदम उकेर पाना....
इतने सहज कोमल हो कर
वाह

अनूप शुक्ल said...

आखिरी पैराग्राफ़ छोड़कर बाकी सब जारी रहे। सुन्दर भाव!

"अर्श" said...

मै आँचल यकीन का बिछाये ...ye sentance mujhe jhakjhor ke rakh diya ... kya kamaal ki parikalpana hai .itani umda baat aapke lekhani se hi baahar aasakti hai.... ati sundar..

badhaee

arsh

नीरज गोस्वामी said...

हमेशा की तरह रेशमी ज़ज़बात शब्दों में पिरो दिए हैं आपने...बेहद खूबसूरत रचना...वाह.
नीरज

विनय said...

बहुत सुन्दर रचना है!

इक प्रश्न पूछू क्या आप मुझसे नाराज़ हो?

---
गुलाबी कोंपलें

seema gupta said...

" @ विनय आपसे कोई नाराजगी नहीं है....इधर कुछ दिनों से काम में अधिक व्यस्त होने की वजेह से ब्लॉग पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाई और आपकी कई रचनाये शायद नहीं देख पाई..."

Regards

Dr.Bhawna said...

Bahut khub !

मीत said...

हवाओं को रंगता रहा वो
इन्द्रधनुषी ख्वाबो की तुलिका से
मै बंद पलकों मे
उन्हें बिखेरती रही ....
बहुत सुंदर... शब्द....
मीत

विक्रांत बेशर्मा said...

आज सभी वादों का वजूद

अपना आस्तित्व खोने लगा .......
मै अवाक टूटते मिटते हुए

उन्हें देखती रही........

बहुत खूब सीमा जी ...बहुत ही सुन्दर रचना है !!!!!!!!

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

sirf wwwwwaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhh.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

sirf wwwwwaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhh.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही खूबसूरत भाव.

फ़ुरसतिया जी से सहमत.हमको ये वाले तक ही आकर रुकना पडा .

हवाओं को रंगता रहा वो

इन्द्रधनुषी ख्वाबो की तुलिका से

मै बंद पलकों मे

उन्हें बिखेरती रही ....


नायाब रचना.

रामराम.

manoj raidas said...

बहुत सुन्दर रचना है!
बेहद खूबसूरत रचना...

राज भाटिय़ा said...

अपने स्पर्श की नमी से वो

उन पुष्पों को जिलाता रहा
मै मासूम शिशु की तरह

उन्हें सहेजती रही......
वाह क्या बात है, बहुत ही सूंदर.
धन्यवाद

PRAN SHARMA said...

SEEMA JEE ,
JAB KABHEE AAPKE BLOG PAR
AANE KAA SUAVSAR MILTAA HAI,KOEE
N KOEE "SUCHCHA"MOTEE HAATH MEIN
LAG HEE JAATAA HAI.AB DEKHIYE N,
AAPKEE NIMN PANKTIYON KO KAUN PADH-
SUNKAR SAHEJNE KEE KAUSHISH NAHIN
KAREGA---
BIKHERTAA RAHAA
VAADON KE PUSHP VO
MAIN AANCHAL YAQEEN
KAA BICHHAYE
UNHEN
SAMETTEE RAHEE
KHOOB!BAHUT KHOOB!!BAHUT HEE KHOOB!

Arvind Mishra said...

अनुभूति के स्तर पर आपकी कवितायें बहुत मारक हैं -इसलिए एक बार मैंने कहा था (याद हो या न याद हो! ) मुझे आपकी कवितायेँ पढने में डर सा लगता है क्योंकि ये सहज ही संवाद बनाती हैं और आत्मोत्सर्ग ( एल्त्रुइज्म ) प्रवृत्ति को सहसा ही दुलरा जाती हैं !
यह कविता भी मारकता की वही रुख अख्तियार किये है !

RAJNISH PARIHAR said...

बहुत ही सुन्दर भाव है..और उतनी ही गहराई भी...!हम न जाने कितनी चीज़ों को रोजाना टूटते बिखरते देखते है....अवाक्....खड़े हुए....!धन्यवाद..

दिगम्बर नासवा said...

ख्वाब, वादे, स्पर्श....अस्तित्व ....गहरी सोच और खूबसूरत एहसास से भरी नज़्म.........
अक्सर इंसान के जीवन में कितनी ही विश्वास, कितनी ही सचाई रो टूट ती और जुड़ती रहती है

आपकी रचनाओं में अजीब सी बैचनी छटपटाहट दिखाई देती है जो आपके लेखन की सार्थक्त को प्रगट करती है

kumar Dheeraj said...

सीमा जी आपने बेहतरीन कविताई सोच लिखी है । पढ़कर काफी अच्छा लगा । खासकर ये पंक्तिया मुझे काफी बेहतर लगा ।
बिखेरता रहा वादों के पुष्प वो

मै आँचल यकीन का बिछाये

उन्हें समेटती रही....शुक्रिया

Birds Watching Group Ratlam (M.P.) said...

beutifully expressed through words & submitted photos

अनुपम अग्रवाल said...

वादोँ के पुष्प
यादोँ मेँ समेटते रहे

अभिन्न said...

सार्थक ओर सारगर्भित
रोचक ओर साहित्यिक
सुन्दर शब्द संयोजन
वायदे ओर यकीं
पुष्प ओर आँचल
..........लाजवाब

प्रकाश बादल said...

वाह बहुत ही खूबसूरत कविता! एक-एक पंक्ति बेहतर से बेहतरीन।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बड़ी नाज़ुक सी कविता... बधाई!

hem pandey said...

दर्द की अभिव्यक्ति में आपको महारत हासिल है.

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

सुन्दर शब्द संयोजन है ...शुक्रिया.

रचना गौड़ ’भारती’ said...

लगातार लिखते रहने के लि‌ए शुभकामना‌एं
सुन्दर रचना के लि‌ए बधा‌ई
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहि‌ए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
http://www.rachanabharti.blogspot.com
कहानी,लघुकथा एंव लेखों के लि‌ए मेरे दूसरे ब्लोग् पर स्वागत है
http://www.swapnil98.blogspot.com
रेखा चित्र एंव आर्ट के लि‌ए देखें
http://chitrasansar.blogspot.com

Harkirat Haqeer said...

बिखेरता रहा वादों के पुष्प वो

मै आँचल यकीन का बिछाये

उन्हें समेटती रही....


अपने स्पर्श की नमी से वो

उन पुष्पों को जिलाता रहा
मै मासूम शिशु की तरह

उन्हें सहेजती रही......

बहुत ही खूबसूरत रचना....वाह ...!!

मा पलायनम ! said...

मै मासूम शिशु की तरह
उन्हें सहेजती रही...... बहुत सुन्दर रचना

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

कोमल संवेदनाओं का बेहतरीन चित्रण...

संदीप शर्मा Sandeep sharma said...

हवाओं को रंगता रहा वो

इन्द्रधनुषी ख्वाबो की तुलिका से

मै बंद पलकों मे

उन्हें बिखेरती रही ....

खूबसूरत रचना.... लाजवाब

Science Bloggers Association said...

आज सभी वादों का वजूद
अपना आस्तित्व खोने लगा .......
मै अवाक टूटते मिटते हुए
उन्हें देखती रही........

जिंदगी की कटु सच्‍चाइयों को रेखांकित करती कविता।

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेहतरीन.............. वाह..

बवाल said...

Aadarniya seemaajee, itanaa behatareen kyon likh deteen hain aap ? haa haa. Hamaaree taraf se bahut bahut badhaaiyaan. is atisundar kavitaa ke liye.

महामंत्री - तस्लीम said...

आज सभी वादों का वजूद
अपना आस्तित्व खोने लगा .......
मै अवाक टूटते मिटते हुए
उन्हें देखती रही........

हकीकत के करीब ले जाती कविता।

मोहन वशिष्‍ठ said...

आज सभी वादों का वजूद
अपना आस्तित्व खोने लगा .......
मै अवाक टूटते मिटते हुए
उन्हें देखती रही........

बेहतरीन लिखा आपने

Mukesh Garg said...

har line har sabd itna accha hai ki sabd hi nhi hai mere pass tariff ke liye.




dhero badhiyo ke sath dhero subhkamnayae