3/02/2009

"तुम चाहो तो"

"तुम चाहो तो"

एक अधूरे गीत का
मुखडा मात्र हूँ,
तुम चाहो तो
छेड़ दो कोई तार सुर का
एक मधुर संगीत में
मै ढल जाऊंगा ......

खामोश लब पे
खुश्क मरुस्थल सा जमा हूँ
तुम चाहो तो
एक नाजुक स्पर्श का
बस दान दे दो
एक तरल धार बन
मै फिसल जाऊंगा......

भटक रहा बेजान
रूह की मनोकामना सा
तुम चाहो तो
हर्फ बन जाओ दुआ का
ईश्वर के आशीर्वाद सा
मै फल जाउंगा.....


राख बनके अस्थियों की
तिल तिल मिट रहा हूँ
तुम चाहो तो
थाम ऊँगली बस
एक दुलार दे दो
बन के शिशु
मातृत्व की ममता में
मै पल जाऊंगा .....

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SeemaGupta/tum_chaho_to.htm

53 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

राख बनके अस्थियों की
तिल तिल मिट रहा हूँ
तुम चाहो तो
थाम ऊँगली बस
एक दुलार दे दो
बन के शिशु
मातृत्व की ममता में
मै पल जाऊंगा .....


नायाब रचना. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

Arvind Mishra said...

अरे पहली टिप्पणी तो कहीं और हो गयी इस कविता पर ! हाँ यह आपकी बेहतरीन कविताओं मे से एक होने जा रही है -बधाई !

Mansoor Ali said...

Duaao ke liye aamin, ichchhao ke liye shubh kaamnaye...
sundar abhivyakti, badhaai.

अनूप शुक्ल said...

बढ़िया है। सारी तमन्नायें पूरी हों!

neeshoo said...

आपकी रचनाएं बहेतरीन होती हैं । ये कविता भी उनमें से एक है । बधाई

"अर्श" said...

भटक रहा बेजान
रूह की मनोकामना सा
तुम चाहो तो
हर्फ बन जाओ दुआ का
ईश्वर के आशीर्वाद सा
मै फल जाउंगा.....

नायब तरीके लिखा है आपने ,बहोत ही खुबसूरत अल्फाजों से सजी कविता....उतने ही सुन्दर भाव


अर्श

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

बहुत सुन्दर शब्दों से पिरोई बढ़िया रचना . धन्यवाद.

Pratap said...

इस बार कुछ कहने का नहीं अपितु बस पढ़ते रहने का मन कर रहा है.
अति सुन्दर !!!!

MANVINDER BHIMBER said...

खामोश लब पे
खुश्क मरुस्थल सा जमा हूँ
तुम चाहो तो
एक नाजुक स्पर्श का
बस दान दे दो
एक तरल धार बन
मै फिसल जाऊंगा......
बहुत सुन्दर शब्दों से पिरोई बढ़िया रचना

अल्पना वर्मा said...

हर्फ बन जाओ दुआ का
ईश्वर के आशीर्वाद सा
मै फल जाउंगा.....

भावपूर्ण कविता.
गहराई समेटे हुए.

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह सीमा जी, बेहतरीन समर्पण गीत.... बधाई स्वीकारें..

mehek said...

बन के शिशु
मातृत्व की ममता में
मै पल जाऊंगा waah behad sundar bhav,sundar kavita bahut badhai.

Vijay Kumar Sappatti said...

Aadarneey Seema ji ,

Sorry for late arrival, I was on tour for so many days...

ek bahut pyaari si nazm , jiska har lafz kabile tareef hai .. aur specially ...ye lines

राख बनके अस्थियों की
तिल तिल मिट रहा हूँ
तुम चाहो तो
थाम ऊँगली बस
एक दुलार दे दो
बन के शिशु
मातृत्व की ममता में
मै पल जाऊंगा .....

sach hi to hai .. kya behatreen likha hai ... padhkar bada sakun mila....

aapki lekhni ko salaam ..

maine bhi kuch naya likha hai , krupya padhiyenga ...

aapka
vijay

डॉ .अनुराग said...

राख बनके अस्थियों की
तिल तिल मिट रहा हूँ
तुम चाहो तो
थाम ऊँगली बस
एक दुलार दे दो
बन के शिशु
मातृत्व की ममता में
मै पल जाऊंगा .....


shayad koi naari hi aisi sneh bhari paati likh sakti thi...

मीत said...

भटक रहा बेजान
रूह की मनोकामना सा
तुम चाहो तो
हर्फ बन जाओ दुआ का
ईश्वर के आशीर्वाद सा
मै फल जाउंगा.....
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...
मीत

मोहिन्दर कुमार said...

गुनगुनाने के लिये एक सुन्दर भावप्रद गीत..

नीरज गोस्वामी said...

बन के शिशु
मातृत्व की ममता में
मै पल जाऊंगा ....
क्या कहने हैं...वाह वा....लिखते रहिये...ऐसे ही...शुभकामनाएं.
नीरज

रंजन said...

बहुत सुन्दर..

अंतिम पंक्तिया दिल को छु गई..

Amit Verma said...

Great One,
An absolute sitter..

Amit verma

Science Bloggers Association said...

राख बनके अस्थियों की
तिल तिल मिट रहा हूँ
तुम चाहो तो
थाम ऊँगली बस
एक दुलार दे दो
बन के शिशु
मातृत्व की ममता में
मै पल जाऊंगा .....


बहुत सुन्दर विचार हैं, हार्दिक बधाई।

मुंहफट said...

तुम चाहो तो
एक नाजुक स्पर्श का
बस दान दे दो....
मातृत्व की,
आशीष की,
अभिव्यक्ति की,
....दिनों बाद एक शिशु-उच्छ्वास से ओतप्रोत मां के शब्दार्थ. और वे पंक्तियां..
मां मुझे
मत भूल जाना,
याद आना इस तरह
जैसे सुबह की
ओस,
नभ की रोशनी
या हृदय में उतरी हुई
अमराइयां...

अथाह हार्दिक अभिव्यक्ति पर बधाई!

दिगम्बर नासवा said...

खामोश लब पे
खुश्क मरुस्थल सा जमा हूँ
तुम चाहो तो
एक नाजुक स्पर्श का
बस दान दे दो
एक तरल धार बन
मै फिसल जाऊंगा.....

आपकी कविताओं में जो गहरा एहसास होता है वो इस कविता की हर छंद में बखूबी नज़र आता है..........
लगता है जैसे स्वतः ही बहती हुयी आ रही कविता, अनुपम कृति है यह आपकी

शोभा said...

खामोश लब पे
खुश्क मरुस्थल सा जमा हूँ
तुम चाहो तो
एक नाजुक स्पर्श का
बस दान दे दो
एक तरल धार बन
मै फिसल जाऊंगा......
बहुत खूब।

अमिताभ श्रीवास्तव said...

राख बनके अस्थियों की
तिल तिल मिट रहा हूँ
तुम चाहो तो
थाम ऊँगली बस
एक दुलार दे दो
बन के शिशु
मातृत्व की ममता में
मै पल जाऊंगा .....

kya baat he..lazavaab..
antim panktiyo ne mujhe vakai me aanand aa gaya..iske nepathya me jo mene vichaar kiya usane mujhe darshanlok me daal diya..

Udan Tashtari said...

लाजबाब...अति सुन्दर.

अनिल कान्त : said...

बहुत सुन्दर रचना ....

राज भाटिय़ा said...

बन के शिशु
मातृत्व की ममता में
मै पल जाऊंगा .....
आप की इस कविता के लिये तो तारीफ़ के शव्द भी कम पड रहे है, बहुत ही सुंदर.
धन्यवाद

Suresh Chnadra Gupta said...

बहुत सुन्दर. अपूर्णता से पूर्णता की ओर किसी का साथ लेकर.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

avarnniya, adbhut, avismarniya

मोहन वशिष्‍ठ said...

भटक रहा बेजान
रूह की मनोकामना सा
तुम चाहो तो
हर्फ बन जाओ दुआ का
ईश्वर के आशीर्वाद सा
मै फल जाउंगा.....

वाह जी वाह आपकी हर रचना बेहतरीन होती है और यह कविता भी उन्‍हीं बेहतरीन मोतियों में से एक है बारम्‍बार बधाई अच्‍छी कविता के‍ लिए

देरी के लिए माफी

zakir husain said...

खामोश लब पे
खुश्क मरुस्थल सा जमा हूँ
तुम चाहो तो
एक नाजुक स्पर्श का
बस दान दे दो
एक तरल धार बन
मै फिसल जाऊंगा......
जितनी नाज़ुक ख्वाहिश, उतनी नाज़ुक कविता.
बेमिसाल
!!!!!!!!!!!!!!!!

महामंत्री - तस्लीम said...

राख बनके अस्थियों की
तिल तिल मिट रहा हूँ
तुम चाहो तो
थाम ऊँगली बस
एक दुलार दे दो
बन के शिशु
मातृत्व की ममता में
मै पल जाऊंगा .....

सुन्दर रचना कही है आपने। बधाई।

G M Rajesh said...

हर्फ बन जाओ दुआ का
ईश्वर के आशीर्वाद सा
मै फल जाउंगा.....

kaafi dino baad duaaon ki viraasat mili

compliments for a good poetry

G M Rajesh said...

beautiful poetry

Birds Watching Group Ratlam (M.P.) said...

good relections of feelings

anilpandey said...

aaya tow kafi dino baad pr kawita ko pdhkr aisa lga jaise roj hi pdhta hoon aur roj hi padhta rhoon .

anilpandey said...

aaya tow kafi dino baad pr kawita ko pdhkr aisa lga jaise roj hi pdhta hoon aur roj hi padhta rhoon .

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

ागर बेहतरीन से बढकर कोई ओर शब्द होता तो मैं वो ही प्रयोग करता........आभार

--- ''अम्बरीष मिश्रा ''का छोटा सा ''प्रयास'' said...

आप का रोमांटिक ब्लॉग देखा तो अच्छा लगा कि
रोमांटिक के कितने दीवाने है
कितने परवाने है
पर........ कितने अपने है
कितने बेगाने है
इस भीड़ में कई तराने है
पर अफशोश
सब अनजाने है
आप का . . . . .
adv.ambrish@gmail.com

आवारा प्रेमी said...

सच
प्रेम के कितने रंग होते हैं
सच
प्रेम कितना तरल होता है
सच
आप कितना अच्छा लिखती हैं
सच
आप का ब्लॉग कितना सुंदर है
सच
आपके भीतर का कलाकार कितना सुघर है
सच
सब आपकी रचनाओं जितना सुंदर
सच
आपके ब्लॉग जितना सुंदर
सच
आपकी रचनाओं जितना सुंदर
सच
आपके गहरे एहसास जितना सुंदर
सच
आपके अंदर की ममता जितना सुंदर
सच
आपके अंतरात्मा जितना सुंदर
सच
आपकी संपूर्णता जितना सुंदर
पहली-पहली बार
पहली-पहली टिप्पणी
पहली-पहली भावनाएं
पहली-पहली बार ढेरों सम्मान
आपके लिए.

PN Subramanian said...

बन के शिशु
मातृत्व की ममता में
मै पल जाऊंगा .....
हमने दीर्घ निश्वास लेकर शांति का अनुभव किया. बहुत सुन्दर रचना.

Shastri said...

"तुम चाहो तो
थाम ऊँगली बस
एक दुलार दे दो
बन के शिशु
मातृत्व की ममता में
मै पल जाऊंगा ....."

पूरी रचना को कई बार पढ गया. बहुत सशक्त और भावपूर्ण तरीके से की गई रचना!!

सस्नेह -- शास्त्री

-- हर वैचारिक क्राति की नीव है लेखन, विचारों का आदानप्रदान, एवं सोचने के लिये प्रोत्साहन. हिन्दीजगत में एक सकारात्मक वैचारिक क्राति की जरूरत है.

महज 10 साल में हिन्दी चिट्ठे यह कार्य कर सकते हैं. अत: नियमित रूप से लिखते रहें, एवं टिपिया कर साथियों को प्रोत्साहित करते रहें. (सारथी: http://www.Sarathi.info)

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

सचमें अजब केमिस्ट्री है साथ, स्पर्ष और स्नेह की!

Science Bloggers Association said...

राख बनके अस्थियों की
तिल तिल मिट रहा हूँ
तुम चाहो तो
थाम ऊँगली बस
एक दुलार दे दो
बन के शिशु
मातृत्व की ममता में
मै पल जाऊंगा .....

फिर फिर बधाई इस सुंदर कविता के लिए।

RAJNISH PARIHAR said...

wow...wonderfull......

Prem Farrukhabadi said...

खामोश लब पे
खुश्क मरुस्थल सा जमा हूँ
तुम चाहो तो
एक नाजुक स्पर्श का
बस दान दे दो
एक तरल धार बन
मै फिसल जाऊंगा......
meri man pasand panktiyan. badhaai ho.

Tarun said...

अंतिम पैराग्राफ तो कमाल का है

लाल और बवाल (जुगलबन्दी) said...

आपको पता है सीमाजी आप अब अजब लिखने लगी हैं। बहुत ही लाजवाब रच बैठी हैं जी आप! क्या कहा जाए आपकी तारीफ़ में बडी़ ही मुश्किल आन पड़ी है। आप से ही पूछ कर नए शब्द गढ़ने पड़ेंगे आप की रचना की तारीफ़ के लिए। हा हा।

apurn said...

classical one
bahut sunder

रविकांत पाण्डेय said...

कोमल सी मन को छू लेनेवाली रचना।

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

रंगों के पर्व होली की आपको बहुत बहुत हार्दिक शुभकामना .

Pyaasa Sajal said...

shuru se ant tak zordaar hai..mujhe shuruvaat aur ant ki panktiyaan sabse achhi lagi

Mukesh Garg said...

bahut hi kuhb surat bahut hi umda dhero badhiya