2/07/2011

"चांदनी पीती रही"


"चांदनी पीती रही"

आँखे सुराही घूंट घूंट
चांदनी पीती रही
इश्क की बदनाम रूहें
अनकहे राज जीती रही
रात रूठी बैठी रही
नाजायज ख्वाब के पलने झुला
नींद उघडे तन लिए
पैरहन खुद ही सीती रही
हसरतों के थान को
दीमक लगी हो वक़्त की
बेचैनियों के वर्क में
उम्र ऐसी बीती रही
आँखे सुराही घूंट घूंट
चांदनी पीती रही

20 comments:

निर्मला कपिला said...

बहुत अच्छी जानकारी है पत्रिका के बारे मे। लेकिन मै तो आपकी कविता पढ रही हूँ और पढे जा रही हूँ
आँखे सुराही घूंट घूंट
चांदनी पीती रही
कहाँ से ऐसे एहसास ढूँढ कर लाती हैं?

दीमक लगी हो वक़्त की
बेचैनियों के वर्क में
उम्र ऐसी बीती रही
वाह बहुत भावमय रचना है बधाई।
निर्मला कपिला

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

सीमा जी आपकी रचना पढ़ के मुझे वो गाना याद आ गया, "रात भर बैरन निगोड़ी चांदनी चुभती रही", फिल्म आप की कसम से!
आपकी रचनाएँ हमेशा ही ताजगी का एहसास कराती हैं!
आफरीन!

सतीश सक्सेना said...

बहुत खूब सीमा जी ....शुभकामनायें !

Mukesh Kumar Sinha said...

pyari si rachna...badhai.:)

ताऊ रामपुरिया said...

आँखे सुराही घूंट घूंट
चांदनी पीती रही
इश्क की बदनाम रूहें
अनकहे राज जीती रही


अत्यंत भावपूर्ण और सशक्त रचना, शुभकामनाएं.

रामराम.

Pradeep said...

सीमा जी प्रणाम !

"नींद उघडे तन लिए
पैरहन खुद ही सीती रही"

वाह क्या बात कही है.....हम तो कायल हो गए आपकी लेखनी के ... बहुत खूब !

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत खूबसूरत,आभार.

संजय भास्कर said...

आपकी रचनाएँ हमेशा ही ताजगी का एहसास कराती हैं!

संजय भास्कर said...

वसंत पंचमी की ढेरो शुभकामनाए

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर सीमा जी, धन्यवाद

क्रिएटिव मंच-Creative Manch said...

"दीमक लगी हो वक़्त की
बेचैनियों के वर्क में
उम्र ऐसी बीती रही"

लाजवाब
गजब की पंक्तियाँ हैं
ऐसा लगा जैसे गुलज़ार को पढ़ रहे हैं
बधाई
आभार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

प्रिय सीमा गुप्ता जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

आँखे सुराही घूंट घूंट
चांदनी पीती रही

वाऽऽह ! क्या बात है …

आपकी पुरानी पोस्ट्स भी देखी …
बहुत ख़ूबसूरत भाव हैं आपकी रचनाओं में ।
मुबारकबाद !

आपका ब्लॉग भी इतना सुंदर है … ऊपर - नीचे हर कहीं जैसे ख़ूबसूरत फूल महक रहे हैं … अरे ! ये तो आपकी तस्वीरें हैं … :)

बसंत पंचमी सहित बसंत ॠतु की हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !

- राजेन्द्र स्वर्णकार

सुनील गज्जाणी said...

बहुत सुंदर सीमा जी, धन्यवाद

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

बहुत सुन्दर कविता ...वाह

दिगम्बर नासवा said...

हसरतों के थान को
दीमक लगी हो वक़्त की
बेचैनियों के वर्क में
उम्र ऐसी बीती रही ...

अधूरी हसरतों के साथ जीना आसान नहीं होता ... उम्र भर एक प्यास का एहसास रहता है ... बेचैनी सी रहती है ...
बहुत गहरी अनुभूति से गुजारती है ये रचना ..

Kunwar Kusumesh said...

हसरतों के थान को
दीमक लगी हो वक़्त की
बेचैनियों के वर्क में
उम्र ऐसी बीती रही

बड़े नए नए प्रतीक और बिम्ब देखने को मिले आपकी कविता में.

Sunil Kumar said...

हसरतों के थान को
दीमक लगी हो वक़्त की
बेचैनियों के वर्क में
उम्र ऐसी बीती रही
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति खुबसूरत अहसासों की अच्छी लगी , बधाई

Deepak Saini said...

बहुत खूब सीमा जी ....शुभकामनायें !
बहुत सुन्दर कविता ...वाह

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति !

Hadi Javed said...

हसरतों के थान को
दीमक लगी हो वक़्त की
बेचैनियों के वर्क में
उम्र ऐसी बीती रही...................ज़िन्दगी की तल्ख़ सच्चाइयों को उजागर करती हुई भावपूर्ण दर्द से लबरेज़ कुछ अनकहे प्रश्न उठती हुई सुन्दर कविता सीमा जी इस कविता की रचना करना भी कलेजे का काम है.....बधाई स्वीकार करें