8/30/2010

"कभी यूँ भी हो "


"कभी यूँ भी हो "

कभी यूँ भी हो
देखूं तुम्हे ओस में भीगे हुए
रेशमी किरणों के साए तले सारी रात


चुन लूँ तुम्हारी सिहरन को
हथेलियों में थाम तुम्हारा हाथ

महसूस कर लूँ तुम्हारे होठों पे बिखरी
मोतियों की कशमश को
अपनी पलकों के आस पास

छु लूँ तुम्हारे साँसों की उष्णता
रुपहले स्वप्नों के साथ साथ

ओढ़ लूँ एहसास की मखमली चादर
जिसमे हो तुम्हरी स्निग्धता का ताप

कभी यूँ भी हो .....
देखूं तुम्हे ओस में भीगे हुए
रेशमी किरणों के साए तले सारी रात


26 comments:

P.N. Subramanian said...

"ओढ़ लूँ एहसास की मखमली चादर
जिसमे हो तुम्हरी स्निग्धता का ताप"
सुन्दर रचना और सुन्दर अभिव्यक्ति.

Mukesh Kumar Sinha said...

khubshurat .........:)

ek pyari ahsaas dilati rachna!!

Parul said...

its so beautiful...!

वन्दना said...

wah...........behad khoobsoorat ahsaas...........sundar bhav sanyojan.

Rakesh Kaushik said...

Kya baat hai. madam

Fantastic. Owesome


Realy close to the thought of many lovers!


Rakesh Kaushik

रोहित said...

bahut sundar..
dil ko chuti hui rachna!

विवेक सिंह said...

बहुत सुन्दर ।

राज भाटिय़ा said...

अति सुंदर रचना जी धन्यवाद

अभिन्न said...

बहुत ही रोमानी, आपकी यह कविता आपकी अन्य कविताओं की तरह नहीं है ,बहुत बहुत बहुत ही अच्छी लगी यह कविता . निम्न पंक्तियाँ तो बहुत ही अच्छी लगी
लूँ तुम्हारी सिहरन को
हथेलियों में थाम तुम्हारा हाथ
और;
महसूस कर लूँ तुम्हारे होठों पे बिखरी
मोतियों की कशमश को
अपनी पलकों के आस पास
उम्मीद है आपके अगले संग्रह में इसी तरह की कविताये पढने को मिलेंगी

Akhtar Khan Akela said...

bhn simaa ji aapki rchnaa pdh kr aesaa lgaa ke ise baar baar pdho or men baar baar pdhta rhaa hr baar nyin umng,nyaaflsfaa,nyaa ehsaas nye alfaaz nyaa andaaz maashaa allah mzaa agyaa bdhaayi ho. akhtar khan akeal kota rajsthan

ओशो रजनीश said...

अच्छी कविता लिखी है आपने .......... आभार

कुछ लिखा है, शायद आपको पसंद आये --
(क्या आप को पता है की आपका अगला जन्म कहा होगा ?)
http://oshotheone.blogspot.com

mai... ratnakar said...

wah!! kabhee yoon bhee ho ki itanee khoobsoorat panktiya ek ke baad ek lagatar padhne ko miltee rahen
bahut sundar likha hai

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर और नाजुक!

भूतनाथ said...

और कभी यूँ भी हो कि.......
तुम्हारे अहसासों में बीत जाए ये रात
और सुबह को जिस्म में भरा हो उसांसों का ताप
जब उठूँ तो तुम्हारी आँखें मुझे देखती मिले
और एक नया सवेरा देखूं उन नवीली आँखों से....... !!

दिगम्बर नासवा said...

ओढ़ लूँ एहसास की मखमली चादर
जिसमे हो तुम्हरी स्निग्धता का ताप ..

कभी यूँ भी हो ....
बहुत ही गहरी और लाजवाब ... किसी ख्वाब की तरह मखमल सी नर्म नज़्म .... अंदर तक एहसास में डुबो जाती है ...

zeashan zaidi said...

So nice!

Mayank Bhardwaj said...

बहुत सुन्दर और नाजुक!

मेरी और से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर बहुत बहुत बधाई !

G M Rajesh said...

jajbaat nahi
ye
mahsoosna
hai

रचना दीक्षित said...

सुन्दर रचना और सुन्दर अभिव्यक्ति.

RAJ SINH said...

अरसे बाद आपके ब्लॉग पर आना हुआ .और अनुभूति के एक गहरे एहसास के साथ लिखी कुछ पंक्तियों में लिपटी सघनता मन छू गयी .

बहुत ही सुन्दर !

मोहन वशिष्‍ठ 9991428447 said...

छु लूँ तुम्हारे साँसों की उष्णता
रुपहले स्वप्नों के साथ साथ

very nice seema ji congrats

डॉ. मोनिका शर्मा said...

"ओढ़ लूँ एहसास की मखमली चादर
जिसमे हो तुम्हरी स्निग्धता का ताप"
.............................
सुन्दर रचना और सुन्दर अभिव्यक्ति....बहुत ही सुन्दर !

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बहुत खूब, हर बार की तरह।
---------
ब्लॉगर्स की इज्जत का सवाल है।
कम उम्र में माँ बनती लड़कियों का एक सच।

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

और समय ठहर गया!, ज्ञान चंद्र ‘मर्मज्ञ’, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

जयकृष्ण राय तुषार said...

seemaji aapki kalpnasheelta ka koi jabab nahi hai

मनोज अबोध said...

सीमा जी,
कविता अच्‍छी करती हैं आप
बधाई