12/20/2008

"परिचय "


"परिचय"

सन्नाटा श्रृंगार कर रहा,
पल-पल दिन और रैन का
सरिता भी निस्पंद हुई अब,
चिन्ह ना कोई बैन का
सन्नाटा श्रृंगार......
संध्या की हर साँस है घायल,
गुमसुम तारों की है झिलमिल,
कोपभवन जा छिपी चांदनी,
आँगन सूना नैन का
सन्नाटा श्रृंगार......
खुशियों का बाजार लुटा,
निष्प्राण हुआ मन का मुख्यालय,
रीती भावों की गागरिया................
'परिचय' क्या सुख-चैन का ?
सन्नाटा श्रृंगार कर रहा,
पल-पल दिन और रैन का
(बैन = वार्ता, बातचीत
रीती = खाली)

31 comments:

रंजन said...

आपकी कविता की बात तो रोज करते है...

वैसे आप चित्र भी बहुत अनुठे लगाती है.. बहुत खुबसुरत!!

प्रदीप मानोरिया said...

खुशियों का बाजार लुट गया
निष्प्राण हुआ मन का मुख्यालय
सुंदर शब्दावली अद्भुत भाव

P.N. Subramanian said...

हमें बड़ी ईर्षा होती है. अब सन्नाटे को शृंगार युक्त देख पाना हमारे बस की बात नहीं. सुंदर. आभार.,

रंजन said...

आपकी कविता की बात तो रोज होती है...

आप चित्र भी बहुत खुबसुरत लगाती हैं

विवेक सिंह said...

"निष्प्राण हुआ मन का मुख्यालय"

क्या बात है ! वाह !

Rakesh Kaushik said...

namaskaar seema ji.
kavitayen aapki bahut padhi hai maine. do din pehle navbharat akhbaar me bhi apki ek kriti chapi thi.
kafi umda likhti hai. lekin main aapki soch ki thah nahi pa paya.
aap jo bhi kuch likhi hai bilkul hakar sab se hat kar. yahan aapne snaate ka hi shrngaar kar diya.or vo bhi inti khubi se.

aap sach me bahut hi pratibhashali or badi kaviyatri hai.
mahan to main apko keh nahi sakta. kyonki uske liye aapko shayad bahut lamba rasta tay karna padega.

is rachna ke liye aapko bahut bahut bdhi ho
congratulation!.

Rakesh Kaushik

विनय said...

सचमुच शानदार कविता!

ताऊ रामपुरिया said...

कोपभवन में छुपी चांदनी
अंगना सुना चंचल नैन का


बिल्कुल सही ! कभी कभी चांदनी भी कोपभवन मे जा बैठती है और कभी खिडकी दरवाजे बंद करने के बावजूद जबरन घुस आती है !

बहुत लाजवाब !

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुंदर

संगीता पुरी said...

कविताओं के साथ चित्र भी इतने खूबसूरत.....पढकर और देखकर बहुत अच्‍छा लगा ।

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया रचना है। चित्र भी बहुत सुन्दर हैं।

निष्प्राण हुआ मन का मुख्यालय
रीता है भावों का बर्तन
परिचय मिले न सुख चैन का
सन्नाटे ने श्रृंगार किया है....

मीत said...

निष्प्राण हुआ मन का मुख्यालय

रीता है भावों का बर्तन

परिचय मिले न सुख चैन का
सन्नाटे ने श्रृंगार किया है....

sunder...
---meet

Vijay Kumar Sappatti said...

bahut sundar rachna . man ko chooti hui ..
sannate ka itna shandaar jikr kiya hai ki bus poochiye mat ..
badhai..

pls visit my blog for some new poems.

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

नीरज गोस्वामी said...

कोपभवन में छुपी चांदनी
अद्भुत शब्द प्रयोग....वाह...क्या लिखती हैं आप...
नीरज

मनुज मेहता said...

खुशियों का बाजार लुट गया
निष्प्राण हुआ मन का मुख्यालय

रीता है भावों का बर्तन

परिचय मिले न सुख चैन का
सन्नाटे ने श्रृंगार किया है....


bahut khoob seema ji, bahut hi shaandaar, antim pankti ne to hairaan kar diya.

धीरेन्द्र पाण्डेय said...

कोपभवन में छुपी चांदनी
अंगना सुना चंचल नैन का
काफी सुन्दर धन्यवाद ..

COMMON MAN said...

nit naye shabd kahan se laayen, isliye sirf wah se kaam chalayen.

Arvind Mishra said...

यह कविता भी श्रृंगार के वियोग पक्ष की गहन अनुभूति से अनुप्राणित है !

राज भाटिय़ा said...

सशक्त अभिव्यक्ति !धन्यवाद

बवाल said...

अहो सीमाजी,

ये तो पूर्ण गेयता में लिखी गई अतिसुन्दर रचना है जी आपकी. चित्रों के क्रंदित मौन को कितनी सहज शब्दाभिव्यक्ति प्रदान कर दी आपने.
सन्नाटे का श्रृंगार, सरिता की निस्पंदता, मूक संध्या,चांदनी का कोपभवन, सूना नयनांगन, मन का निष्प्राण मुख्यालय और रीती गागर. शायद सुख-चैन का इससे अधिक व्यथित "परिचय" हो ही नहीं सकता. इस गूढ़ और उत्तम रचना के लिए मेरा सादर नमन निवेदन स्वीकार करें और साथ ही बहुत बहुत बधाई भी.

mukesh said...

bahut hi sunder rachna likhi hai..

bahiya

Udan Tashtari said...

पढ़ लिया-गा लिया. मजा आया.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

वाह! आपके शब्द अनमोल हैं जो भावों को घुट्टी सा पिला देते हैं। हमारे पास इनकी प्रशंसा के शब्द ही नहीं हैं। बधाई...।

"SURE" said...

परिचय मिले न सुख चैन का
............
एकाकीपन ओर सन्नाटे का इतना खूबसूरत चित्रण करने के बाद क्या सुख चैन के परिचय की आवश्यकता रह जाती है ..सिर्फ साहित्य ..ओर उसमे भी काव्य ओर वो भी सीमा जी का रचा हुआ ही इतना शसक्त हो सकता है जो दुखों ओर आंसुओं को भी इतनी जीवटता ओर संजीदगी से पेश किया जाता है की सुखो के परिचय की कोई महता रह ही नहीं जाती

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

आँगन सूना नैन का
सन्नाटा श्रृंगार......
Excellent expression!

प्रकाश बादल said...

वाह वाह वाह वाह..............

dr. ashok priyaranjan said...

भाव और िवचार के समन्वय से रचना प्रभावशाली हो गई है । अच्छा िलखा है आपने । जीवन के सत्य को सामाियक संदभोॆं में यथाथॆपरकर ढंग से अिभव्यक्त िकया है ।-

http://www.ashokvichar.blogspot.com

योगेन्द्र मौदगिल said...

kamaal ki rachna seema g...
badhai.. badhai..

Mumukshh Ki Rachanain said...

सीमा जी,
अद्भुत, सुंदर रचना प्रस्तुति पर मेरा आपको सदर नमन.
निम्न पंक्ति दिल के बहुत करीब लगी...........
'परिचय' क्या सुख-चैन का ?
चन्द्र मोहन गुप्त

Pyaasa Sajal said...

urdu pe aapki pakad dekh li thi...ab jaandaar hindi se bhi saamna ho gaya

ज़ाकिर हुसैन said...

कोपभवन जा छिपी चांदनी,
आँगन सूना नैन का

अद्भुत, सुंदर रचना !