11/12/2009

मौन करवट बदलता नहीं

"मौन करवट बदलता नहीं "

शब्द कोई गीत बनकर
अधरों पे मचलता नही
सुर सरगम का साज कोई
जाने क्यूँ बजता नहीं.....

बाँध विचलित सब्र के
हिचकियों मे लुप्त हो गये ,
सिसकियों की दस्तक से भी,
द्वार पलकों का खुलता नहीं....

रीती हुई मन की गगरिया,
भाव शून्य हो गये,
खामोशी के आवरण मे ,
मौन करवट बदलता नहीं....

26 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.

Udan Tashtari said...

गहरी अभिव्यक्ति!! बधाई....

Kusum Thakur said...

भावपूर्ण अभिव्यक्ति बधाई !!!

रंजन said...

बहुत खुब..

Zeashan Zaidi said...

एक अच्छी गीतकार के बाद ये नया रूप Queen of Puzzles भी काफी आकर्षक लगा.

महफूज़ अली said...

बाँध विचलित सब्र के
हिचकियों मे लुप्त हो गये ,
सिसकियों की दस्तक से भी,
द्वार पलकों का खुलता नहीं....

bahut hi gahri abhivyakti ke saath ek bahut hi sunder kavita hai......

bahut achchi lagi yeh kavita...

Regards...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

भावों का वैयक्तिकरण करने में आपको महारत है। और यही वजह है कि आपकी कविता में चार चाँद लग जाते हैं तथा वह ज्यादा अपीलिंग हो जाती है।
--------
बहुत घातक है प्रेमचन्द्र का मंत्र।
हिन्दी ब्लॉगर्स अवार्ड-नॉमिनेशन खुला है।

Rakesh Kaushik said...

Pdhkar aisa laga jaise kahin mushladdhar barish hokar ruki ho. or mitti ki vo sondhi sondhi khusbhu har kahin fail gayi ho. bahut hi atmik lagi . lekin kafi dino baad aapki posst aayi. jisse khalipan jo bna tha vo bhar gya.

Aisa lga jaise k Sachin Tendulkar ne fir se koi chamtkarik pari kheli ho. matlab i feel proud to hav freind like u.

मीत said...

उफ्फ कितना दर्द भर दिया है आपने अपने शब्दों से इस रचना में...
सिसकियों की दस्तक से भी,
द्वार पलकों का खुलता नहीं....
बहुत सुंदर... अपने आप में डूबा रही है ये रचना...
मीत

दिगम्बर नासवा said...

शब्द कोई गीत बनकर
अधरों पे मचलता नही
सुर सरगम का साज कोई
जाने क्यूँ बजता नहीं.....

DARD BHARI DAASTAAN HAI AAPKI NAZM ..KABHI KBAHI SABR KAA BAANDH TOOT JAATA HAI PAR AANSOO THAM JAATE HAIN AUR SISKIYAAN GHER LETI HAIN UN KE SOONE PAN KO .... GAHRE BHAAV LIYE KAMAAL KI RACHNA HAI ...

anilpandey said...

khanoshi ke aawaran men maun karwat badalta nhin ' bahut hi sundar kawita. antarik bhawnaonko padhnen men kitni sarthak pahal.

"अर्श" said...

sach me maun karwat badalta nahi ... gambhir baat kahi hai seema ji aapne... aur mujhe lagtaa hai ke saari paheliyaa aap hi jitati hai itane purashkaar mile hai... kya kamaal hai ye waah badhaayee is baat ke liye... aabhaar


regads
arsh

ताऊ रामपुरिया said...

शब्द कोई गीत बनकर
अधरों पे मचलता नही
सुर सरगम का साज कोई
जाने क्यूँ बजता नहीं.....


अक्सर कई बार ऐसा होजाता है. बहुत सशक्त संप्रेषण है. शुभकामनाएं.

रामराम.

राज भाटिय़ा said...

बहुत गहरे भाव लिये है आप की रचना.....

अभिन्न said...

'मौन करवट बदलता नहीं' बड़ी ही भावपूर्ण रचना है सुर ओर सरगम का साथ तो अनंत काल से है
गीत न बनते हुए भी बन गया है ,बहुत सुन्दर गीत है चित्र ओर भी मनमोहक ,मौन को करवट बदलनी होगी अवश्य ओर अवश्य

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

वाह! क्या बात है...!
हर बार की तरह भावपूर्ण।
शुक्रिया!

dr. ashok priyaranjan said...

बेहतरीन रचना
maine apney blog pr ek lekh likha hai- gharelu hinsa-samay mile to padhein aur comment bhi dein-

http://www.ashokvichar.blogspot.com


मेरी कविताओं पर भी आपकी राय अपेक्षित है। यदि संभव हो तो पढ़ें-

http://drashokpriyaranjan.blogspot.com

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

Fine ,sentimental poem that you always write.
Have my best wishes.
with regards,
dr.bhoopendra

Birds Watching Group said...

dil wah wah kar uthtaaa ji

rajeshghotikar said...

wah ji kyaa khoob dikhaye aansu bhi

kahte karvate badaltaa maun bhi nahi

gagariya soony hui man ki

geet adhron par machaltaa nahi

wah wah wah
kya khoob kahi

अल्पना वर्मा said...

सिसकियों की दस्तक से भी,

द्वार पलकों का खुलता नहीं....

waah!

-kavita mein lay hai ,geet ki khanak hai.
-rachna mein gahan bhaavon ki khubsurat abhivyakti hai.

Science Bloggers Association said...

सुंदर एवं मार्मिक अभिव्यक्ति।
------------------
सिर पर मंडराता अंतरिक्ष युद्ध का खतरा।
परी कथाओं जैसा है इंटरनेट का यह सफर।

Rakesh said...

रीती हुई मन की गगरिया,
भाव शून्य हो गये,
खामोशी के आवरण मे ,
मौन करवट बदलता नहीं..
acha laga aapka bhav v abhivykti ka tareeka..badhai

Nirmla Kapila said...

बाँध विचलित सब्र के
हिचकियों मे लुप्त हो गये ,
सिसकियों की दस्तक से भी,
द्वार पलकों का खुलता नहीं....
संवेदनाओं के झरोखे से झाँकता दर्द बहुत खूब शुभकामनायें

संजय भास्कर said...

lajwaab

openperson said...

आपका ब्‍लॉग बहुत सुंदर है,गजब है