1/25/2010

"बेवफाई को एक नया नाम "

"बेवफाई को एक नया नाम "

मन की आहटों का
एक नाजुक सफर था
तेरे मेरे दरमियाँ ......


ना मुझे चाँद तारो की ख्वाईश
ना तुम्हारी कोई फरमाईश

न मुझ पे तेरी निगाहों का पहरा
न तुझ पे मेरी कोई ज़ोर आजमाईश

दोनों के पास ही तो
उन्मुक्त आसमान था ....

तेरी बेरुखी की खामोश अदा ने
मान हानि का जिक्र क्या किया
यूँ लगा , "बेवफाई को "
एक नया नाम मिल गया ....



30 comments:

Arvind Mishra said...

आपकी लेखनी की एक नयी भावभूमि लिए अभिव्यक्ति -शुक्रिया !

Mithilesh dubey said...

क्या बात है, लाजवाव लिखा है आपने ।

गिरिजेश राव said...

@ तेरी बेरुखी की खामोश अदा ने
मान हानी का जिक्र क्या किया
यूँ लगा , "बेवफाई को "
एक नया नाम मिल गया ....

इसे कहते हैं 'सान्द्र अर्थगुरु' रचनाकर्म !
'हानी' को 'हानि' होना चाहिए क्या ?

निर्मला कपिला said...

तेरी बेरुखी की खामोश अदा ने
मान हानी का जिक्र क्या किया
यूँ लगा , "बेवफाई को "
एक नया नाम मिल गया ....

बहुत खूब प्यार मे मान सम्मान की गुन्जाईश ही कहाँ होती है। लाजवाब रचना है शुभकामनायें

डॉ. मनोज मिश्र said...

ना मुझे चाँद तारो की ख्वाईश
ना तुम्हारी कोई फरमाईश
वाह,उत्क्रिस्ट.

Udan Tashtari said...

ओह!! क्या बात है..बहुत गहरे!

महफूज़ अली said...

बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति के साथ...... बहुत सुंदर रचना.....

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सही कह रही हैं. मान-अभिमान का क्या काम प्रेम के दरमियान.

दिगम्बर नासवा said...

तेरी बेरुखी की खामोश अदा ने
मान हानी का जिक्र क्या किया
यूँ लगा , "बेवफाई को "
एक नया नाम मिल गया ....

सच है जब दोनो ही उन्मुक्त हैं ...... कोई बंधन, इक दूजे से पाने की चाह नही तो सम्मान बीच में क्यों आए ......... नये अर्थ तलाशती अनुपम रचना .........

सतीश सक्सेना said...

बहुत बढ़िया सीमा जी !

सतीश सक्सेना said...

बहुत बढ़िया सीमा जी !

ताऊ रामपुरिया said...

तेरी बेरुखी की खामोश अदा ने
मान हानि का जिक्र क्या किया
यूँ लगा , "बेवफाई को "
एक नया नाम मिल गया ....


बहुत लाजवाब सोच और बेहतरीन अभिव्यक्ति.

रामराम.

अभिन्न said...

sach kaha aapne har vyakti ka ek svtantr astitv hota hai prem,bhav ,sneh ,mitrta aadi use ek dusre ke sameep khinch late hai aur shuru ho jata hai bhavnatmak aur samajik tana bana,sansaar me sabse jyada sudrid aur sabse najook ek hi bandhan hai prem ka bandhan jise bade bade samajik dabav aur rudiyan chah kar bhi tod nahi pati,aur jab tutne par aata hai to sirf ek matr ek anchaha bhav,jinme maan sammman ya hamara ahm,koi bhi ho sakta hai.aap ne bade ki bhavnatmkk aur kavyatmak dhang se apna prstutikaran diya hai.pyar ho ya dard aap ki lekhni shahad me dub kar likh deti hai,

( hindi typing me avrodh aa raha tha isliye roman me likh raha hoon khsma karna)

Rakesh Kaushik said...

It's Beautiful.

anotherlandmark

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

this is awesome...

brilliant!

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर रचना
आप को गणतंत्र दिवस की मंगलमय कामना

ह्रदय पुष्प said...

तेरी बेरुखी की खामोश अदा ने
मान हानि का जिक्र क्या किया
यूँ लगा , "बेवफाई को "
एक नया नाम मिल गया ....
वाह वाह - बहुत खूब

अमृत कुमार तिवारी said...

"तुम्हे भूल पाऊं कभी,
वो पल वक़्त की कोख में नहीं..."

उह! बेहद मार्मिक रचना।

राकेश कुमार said...

दो प्रेमियो के बीच दरख्ते रिश्तो के मर्म को इतनी बखूबी और सवेदना के साथ प्रस्तुत करना... वाकई लाजवाब

मन की आहटों का
एक नाजुक सफर था
तेरे मेरे दरमियाँ ......

सीमा जी मै तो आपकी कविता को अन्दर तक अनुभूत कर जैसे हतप्रभ सा रह जाता हू ...

न मुझ पे तेरी निगाहों का पहरा
न तुझ पे मेरी कोई ज़ोर आजमाईश

दोनों के पास ही तो
उन्मुक्त आसमान था ....

सचमुच बेहतरीन सीमा जी...

सादर
राकेश

psingh said...

सुन्दर रचना
बहुत बहुत आभार

अमिताभ श्रीवास्तव said...

न मुझ पे तेरी निगाहों का पहरा
न तुझ पे मेरी कोई ज़ोर आजमाईश
sambandho aour prem ka aadhaar. ynha vishvaas he, samarpan bhi he aour unmuktuta to vanhi hogi na jnha sachcha prem hoga.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

सीमा जी आदाब
श्रद्देय महावीर जी के ब्लाग मंथन पर
गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में
प्रस्तुत ग़ज़ल पसंद करने के लिये आभार
आपके ब्लाग पर आकर अच्छा लगा
आपकी कविताओं में शब्दों की गहराई ने प्रभावित किया है..
सिलसिला बनाये रखियेगा..
कभी समय मिले, तो 'जज्बात' पर भी तशरीफ़ लायें
सादर
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

G M Rajesh said...

vaah ji
kyaa baat hai
wah ji jajbaat hain

par ye to bataaye naam kya hai

ha ha ha

श्रद्धा जैन said...

तेरी बेरुखी की खामोश अदा ने
मान हानि का जिक्र क्या किया
यूँ लगा , "बेवफाई को "
एक नया नाम मिल गया ...

bahut achchi abhivayakti

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

क्या बात है।
लाजवाब कर दिया।
--------
घूँघट में रहने वाली इतिहास बनाने निकली हैं।
खाने पीने में लोग इतने पीछे हैं, पता नहीं था।

Akanksha Yadav ~ आकांक्षा यादव said...

बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति..उम्दा रचना...बधाई.
__________________
शब्द-शिखर पर इस बार काला-पानी कहे जाने वाले "सेलुलर जेल" की यात्रा करें और अपने भावों से परिचित भी कराएँ.

mukesh said...

itni pyari hai ye kavita jispar hum likhte hai,


--


kiya kuhb likhti ho bada sunder likhti ho,

tum jaha se niyari ho tum dosto me pyari ho,


bahut hi sunder or rachna pane dost ki badhaiya sawikar kare

गुस्ताख़ मंजीत said...

उम्दा...

SUNIL KUMAR said...

बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति के साथ...... बहुत सुंदर रचना.....

http://sunilkefande.blogspot.com

वन्दना said...

प्रेम मे ताने उलहाने तो चलते ही रह्ते हैं और ये अन्दाज़ भी गज़ब का है…………………भाव बहुत ही गहरा है।