
"बंजारा मन "
ये मन फ़िर बंजारा हुआ,
भटकने को बेकरार ,
उन्ही रास्तों पर ,
जहाँ दरख्तों के साये ,
कुछ सूखे टूटे पत्ते ,
पहचानी एक महक ,
उडता हुआ धुल का गुब्बार ,
दूर तक फैला सन्नाटा ,
यादों की किरचे ,
भीगे हुए से पल ,
फीके क़दमों के निशाँ ,
बिखरे पडे हैं लावारिस से,
फ़िर समेट लाने को बेकरार
ये मन फ़िर बंजारा हुआ,
ये मन फ़िर बंजारा हुआ,

http://hindivangmay1.blogspot.com/2008/11/blog-post_2326.html






















32 comments:
ये मन फ़िर बंजारा हुआ,
भटकने को बेकरार ,
उन्ही रास्तों पर ,
जहाँ दरख्तों के साये ,
वाह , वाह ! मन फ़िर बंजारा हुआ, ..
बहुत लाजवाब ! शुभकामनाएं !
कुछ सूखे टूटे पत्ते ,
पहचानी एक महक ,
उडता हुआ धुल का गुब्बार ,
दूर तक फैला सन्नाटा ,
bahot khub likha hai aapne ... bahot sundar panktiyan... dhero badhai aapko......
बेहतरीन!! उम्दा!
वाह यह हुई ना कोई बात ! आशा की किरणें कैसा खुशनुमां माहौल बना देती हैं -अपने माजी से निकलने का एक स्वागतयोग्य प्रयास ! नीड़ का निर्माण फिर ......
उडता हुआ धूल का गुबार, दूर तक फैला सन्नाटा, ये मन फिर बँजारा हुआ , तारीफ़ को बकरार.
ये मन फ़िर बंजारा हुआ,
भटकने को बेकरार ,
पहचानी एक महक ,
उडता हुआ धुल का गुब्बार ,
दूर तक फैला सन्नाटा ,
यादों की किरचे ,
भीगे हुए पल ,
फ़िर समेट लाने को बेकरार
बहुत लाजवाब ! शुभकामनाएं !
ji
aaj jo suchna mujhe mili hai use sunkar mera mann sach me fir se banjara ho gya. mujhe lagta hai ke aapne mere dil ki halat is kavita me byan kar di ha.
Rakesh Kaushik
लगता है बसंत नजदीक ही है !
बहुत लाजवाब !
ये मन फ़िर बंजारा हुआ ..........
सच कहा ये मन है ही कुछ ऐसा रास्ते बहुत हैं लेकिन मंजिल एक है भटक जाता खो जाता चल पड़ता है किसी राह पर एक बंजारे की तरहां न कोई ठिकाना न घर उसका बिल्कुल सही कहे गए आप क़दमों के निशान बिखरे पड़े हैं लावारिस
बहुत ऊँची सोच........
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है आने के लिए
आप
๑۩۞۩๑वन्दना
शब्दों की๑۩۞۩๑
सब कुछ हो गया और कुछ भी नही !! इस पर क्लिक कीजिए
आभार...अक्षय-मन
waah sundar
ये ब्बात है !
आपकी ये अभिव्यक्ती शानदार प्रस्तुत हुई, सीमाजी.
ऐसी सुंदर भावना नज़र आई है ग़ज़ल में, क्या कहना !
बहुत ख़ूब और बहुत बेहतर !
शब्द भाव दोनों हैं सुन्दर कविता बहुत ही प्यारी।
भटका मेरा मन बंजारा पढ़ कर कविता सारी।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
बहुत सुंदर !
हुँ ....बहुत अच्छा है
यह पोस्ट पढ़ने पर मन बंजारा हो गया!
बहुत सुन्दर।
khoobsurat...
again touch my heart..
Seema,
apnay awara dil ko kuch waisi hee kaifiyat mein pata hoon jo is kavita se bayaan ki gayee ha.Kavita padhi aur mun banjara ho gaya...........rawana hua unhee raaton par.....aur Seeamadani ki kavita yaad aa gayee:
"Ulka ke us paar miloonga.....
ya shaayed ous path per jis par tum aaoga..............raahi bhatka chalta hoonga...
पग प्रतीक प्रतिबिम्ब रहित हूँ,
उलका के उस पार मिलूंगा........
मन स्वतंत्र चंचल चितवन हूँ ,
गगन द्वीप जा बैठूंगा....
या फिर उस पथ पर,
जिस पर तुम शायद आओगे .....
प्रेम प्रतीक्षा के प्रसंग में यह पाओगे ,
आशा प्रकाश प्रज्ज्वलित नयन से,
राही भटका ---चलता हूँगा
क्या ???
"सोच रहा हूँ.........! "
सुंदर कविता! पढ़ कर ये मन फ़िर बंजारा हुआ ..........!
ये मन फ़िर बंजारा हुआ,
भटकने को बेकरार ,
उन्ही रास्तों पर ,
जहाँ दरख्तों के साये
सुन्दर कविता
लाजवाब शायरी ...
सीमा जी,
पहला कमेन्ट मेरा हो, हर बार एसा प्रयास करता हूँ, पर पहले से ही इतने कमेन्ट आ जाते है, मेरे लिए बहुत दर्दनाक है...
बहुत ही सुंदर गजल के लिये आप का धन्यवाद
बेहतरीन...बहुत संवेदन शील रचना है ये आपकी..और शब्द तो बस कमाल के चुन कर लती हैं आप....
नीरज
हमरा मन तो ई बांच के ही बंजारा हो लिया!
बहुत अच्छा है
आपकी रचना बहुत ही आध्यात्मिक है / मन की चंचलता तो सर्वविदित है /यह सच है कि मन को स्वच्छंद छोड़ देने से कई बार संकटों का सामना करना पड़ता है क्योंकि कहावत चरितार्थ है कि- मन मुताविक चलने वाला मंकी (बन्दर ) एवं मन को अपने मुताविक चलने वाला "मुनि " होता है /अत: मन पर नियंत्रण आत्महित में भी अभीष्ट है /
मेरे अपने ब्लॉग पर आज संयम पर कुछ विचार लिखे हैं तथा श्री हनुमान सिंह गुर्जर की रचना जो मुनि तरुण सागर जी के स्वास्थ्य कामना हेतु लिखी है पढने का कष्ट करें /
क्या बात है!
बंजारा बंजारा सुनते यह आवारा बंजारा आखिरकार पहुंच ही गया यहां। ;)
फ़िर समेट लाने को बेकरार
ये मन फ़िर बंजारा हुआ,
बहुत सुंदर .लाजवाब .
ये मन फ़िर बंजारा हुआ,
भटकने को बेकरार ,
उन्ही रास्तों पर ,
जहाँ दरख्तों के साये
बहुत ही सुंदर रचना है लाजवाब
यथार्थ-प्रस्तुति के लिये बधाई सीमा जी
बंजारे मन की पीड़ा में समय गुजरता जाता है
भावों का सैलाब बदरवा जैसा मन पर छाता है
bahut hi acchi rachna hai
badhiyan
banjaara to vah hai hee...aavaara bhi hua....
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