11/20/2008

"कभी कभी"

"कभी कभी"

दिल मे बेकली हो जो,
" कभी कभी"
क्यूँ शै बेजार लगे हमे सभी
कोई तम्मना भी न बहला सकी,
क्यूँ हर शाम गुनाहगार लगे"
कभी कभी..........."

26 comments:

प्रदीप मानोरिया said...

बहुत खूब आपने अपने विचारों को सुंदर तरीके से व्यक्त किया है आपका मेरे ब्लॉग पर स्वागत है

ताऊ रामपुरिया said...

क्यूँ हर शाम गुनाहगार लगे"
कभी कभी..........."
बहुत खूब ! वाह वाह ..शुभकामनाएं !

COMMON MAN said...

कभी-कभी तो खुद भी गुनहगार लगने लगता हूं. बहुत खूब क्या लिखा है.

सतीश सक्सेना said...

शुक्रिया के साथ साथ आपकी लेखनी को शुभकामनायें सीमा जी !

Anil Pusadkar said...

सुन्दर,हमेशा की तरह्।

भूतनाथ said...

बहुत सुन्दरतम भाव ! शुक्रिया !

दीपक "तिवारी साहब" said...

क्यूँ शै बेजार लगे हमे सभी
कोई तम्मना भी न बहला सकी,

लाजवाब !

Anonymous said...

Seema,

tmannayen kahaan kab kisko bahlati hain dost
gar wo poori ho bhi jaayen aur aa jaati hain dost
haan magar ek hai tamanna usko paa lene ki dost
raat aur din jiski yaadein aa ke tadpaati hain dost
ab kahaan jaayen ke dil apnaa bahal jaaye kheen
eik maayoosi si hasrat bekali laati hai dost

"अर्श" said...

बहोत बढ़िया लिखा है आपने बहोत खूब..... ढेरो बधाई स्वीकारें

makrand said...

good composition
regards

Akshaya-mann said...

bahut khub.....

कुन्नू सिंह said...

बहुत सूदर कविता। बहुत बढीया।

कविता का एन्ड लाईन भी बहुत अच्छा लगा।

अनूप शुक्ल said...

वाह! वाह!

नीरज गोस्वामी said...

आप की रचनाओं की तारीफ के लिए नए नए शब्द कहाँ से लायें? क्या कहें? बहुत वधिया है जी...हमेशा की तरह...
नीरज

raj said...

बहुत खूब. शुभकामनाएं !

राज भाटिय़ा said...

क्यूँ हर शाम गुनाहगार लगे"
कभी कभी....
धन्यवाद

अनुपम अग्रवाल said...

दिल मे बेकली हो जो,
" कभी कभी"
क्यूँ शै बेजार लगे हमे सभी
कोई तमन्ना भी न बहला सकी,
क्यूँ हर शाम गुनाहगार लगे"
तभी कभी..........."

bahut khoob

bhoothnath said...

दिल में बेकली हो तभी हर शाम गुनाहगार लगे है तभी....
शिद्दत हो गर दिल में तो...अपने ही यार लगे है सभी...!!
यार दो बोल मीठा भी बोल दे तो मान जाऊं मैं अभी...
नफरत से लबालब तिरे ये हर्फ़ तो तलवार लगे है सभी....!!
भीतर जो देख ले आदम तो ख़ुद को बदल ही दे अभी...
बाहर तो इक अपने अपने सिवा खतावार ही लगे है सभी..!!
हर कोई हर किसी को माफ़ कर दे तो सब बदल जाए...
मन में बोझ लेकर जीने से जीना भी दुश्वार लगे है सभी..!!
चन्द साँसे ही सौगात में लेकर आयें हैं हम सब यहाँ...
हर नेमत को आपस में बाँट लें,कि यार लगे है सभी....!!
मुहब्बत भरा दिल ये जो अपने पास ना हो "गाफिल"
चूम कर कलियाँ कहें फूल को,कि खार लगे हैं सभी....!!

बवाल said...

Bahut behtar seemajee sach kaha aapne, khoob kaha aapne.

विनय said...

छोटी मगर भावुक रचना!

मुकुंद said...

सांवली कुछ खामोश सी रात,
सन्नाटे की चादर मे लिपटी,
उनींदी आँखों मे कुछ साये लिए,
ये कैसी शिरकत किए चली जाती है....
बिखरे पलों की सरगोशियाँ ,
तनहाई मे एक शोर की तरह,
करवट करवट दर्द दिए चली जाती है....
कुछ अधूरे लफ्जों की किरचें,
सूखे अधरों पे मचल कर,
लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है...
सांवली कुछ खामोश सी रात अक्सर...


सीमा
आपकी
यह कविता
भीतर तक झझकोर गई.
दो लाइनें हैं-आपके लिए----------
बहुत ठंड होती हैं बरफीली हवाओं की परतें
लाल खून भी कम गरम नहीं होता

Tara Chandra Gupta "MEDIA GURU" said...

bahut sundar.
har sabd kuchh bayan karte hain.

PN Subramanian said...

You have a knack of saying volumes in few words. Thank you.

सचिन मिश्रा said...

Bahut khub.

महावीर said...

बहुत ही सुंदर भावाभिव्यक्ति! बधाई।

bhoothnath said...

uski hasrat jise dil me samaa bhi naa sakoo....itanaa chaahun hun use ki chaah bhi naa sakoo...