
"बिलखता दर्दाना"हर स्वप्न एक बिलखता दर्दाना हुआ,
वक्त के छलावे से अपना याराना हुआ..
रूह सिसकती रही, जख्म मूक दर्शक ,
साँस लिए भी जैसे एक जमाना हुआ...
खूने- दिल से लिखा, अश्कों ने मिटा डाला,
तुझे भुलाने का क्या खूब बहाना हुआ....
पीडा मे नहा, ओढ़ कफ़न भटकती चाहतों का,
जिंदा जी जैसे ख़ुद को ही दफनाना हुआ... 
35 comments:
it's really a very painfull creation from u as u always did in past?
it's nice. n having a quality of pain in it.
Rakesh Kaushik
bahut khoob
अभी अभी मैंने आपकी पिछ्ली तीन रचनायें पढीं जो मैं पहले नहीं पढ सका था, तीनों ही बहुत सुन्दर हैं.
रुह सिसकतॊ रही, जख्म मूक दर्शक,
सांस लिये भी जैसे एक जमाना हुआ....
बहुत खुब.. बहुत गहरी पंक्तिया..
रूह सिसकती रही, जख्म मूक दर्शक ,
साँस लिए भी जैसे एक जमाना हुआ...
शानदार !!!!
badhiya rachna hai...hindi aur urdu dono ka hi aapne istemaal kiya hai..
वाह वाह ! क्या खूब कहा है आपने -
खूने- दिल से लिखा, अश्कों ने मिटा डाला,
बहुत शुभकामनाएं !
बहुत खूब ! धन्यवाद !
खूने- दिल से लिखा, अश्कों ने मिटा डाला,
सही लिखा आपने ! आख़िर, आंसुओं का मोल खून से भी बड़ा होता है ! सुन्दरतम शब्द रचना ! बधाई !
खूब; हमें भी कभी लगता है - ये जीना भी क्या जीना है! पर फिर झाड़-फटक कर जीने लगते हैं!
पीडा मे नहा, ओढ़ कफ़न भटकती चाहतों का,
जिंदा जी जैसे ख़ुद को ही दफनाना हुआ...
great composition
regards
रूह सिसकती रही, जख्म मूक दर्शक ,
साँस लिए भी जैसे एक जमाना हुआ...
बढ़िया बहुत सुंदर लिखा है आपने ..
सुंदर रचना. मैम मेरा नाम प्रशांत वर्मा है और मैं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल का छात्र हूँ. मैम मुझे एक प्रेजेंटेशन बनाना है जिसका विषय है "ब्लॉग की दुनिया में महिलाओं की भागीदारी" . इसे बनाने में आप जैसी महिला ब्लॉगरों की मदद की जरुरत है. अगर कोई आपत्ति न हो, तो मेरी मदद करें. मेरा ईमेल है : mr.pacific07@gmail.com
बहुत दर्द भरा कविता, बहुत सारा दर्द है।
बहुत बढीया कविता।
रूह सिसकती रही, जख्म मूक दर्शक ,
साँस लिए भी जैसे एक जमाना हुआ...
umda lekhan hamesha ki tarah,aap pe lekhani ki asim kripa hai ... bahot badhai aapko seema ji...
हर लाईनें जोरदार हैं -इतनी संवेदनशीलता और गहन भावों के साथ कैसे कोई रचनाकार रह सकता है !
बेहतरीन रचना !
Bahut khub.
रूह सिसकती रही, जख्म मूक दर्शक ,
साँस लिए भी जैसे एक जमाना हुआ...
खूने- दिल से लिखा, अश्कों ने मिटा डाला,
तुझे भुलाने का क्या खूब बहाना हुआ....
waah bahut sundar
bahut sundar satik shabd hain.........
bahut acchi rachna........
भावपूर्ण कविता।
दर्दाना जैसे नए शब्द प्रयोग भी देखने को मिले।
वक्त के छलावे से अपना याराना हुआ..
kya kah diya aapne
सामयिक व सटीक और सच में सार्थक भी
भाव प्रासंगिक हैं सीमा जी
ढेरों बधाई
रूह सिसकती रही, जख्म मूक दर्शक ,
साँस लिए भी जैसे एक जमाना हुआ...
वाह...लाजवाब...क्या कहूँ...शब्द नहीं..
नीरज
रूह सिसकती रही, जख्म मूक दर्शक ,
साँस लिए भी जैसे एक जमाना हुआ...
खूने- दिल से लिखा, अश्कों ने मिटा डाला,
तुझे भुलाने का क्या खूब बहाना हुआ....
बेहतरीन रचना !
साँस लिए भी जैसे एक जमाना हुआ...ओर अभी तक जिन्दा है?
धन्यवाद इन सुन्दर शेरो के लिये
उसका आंसुओं से डूब जाना ही उसका तराना हुआ.....
और हम सबका तो गोया दिल बहलाना हुआ...!!
एक दिन समंदर के रस्ते हम जा रहे थे कि
मछलियों का हमारे भीतर से आना-जाना हुआ...!!
जिन्दगी को तलवार की सान पर धर रखिये
यां तो बे-वफाओं का दिल चीर कर जाना हुआ !!
आज बड़े दिनों बाद उसको देखा किए हम....
आज बड़े दिनों बाद जाकर हमारा नहाना हुआ...!!
गम खाकर तो लाज़वाब हो जाओ मेरे प्यारे
ये क्या कि हर वक्त मुंह का लटकाना हुआ....!!
जिन्दगी हर-दम नए गीत गाती है "गाफिल"
बेशक हमारे पास मौत का गुनगुनाना हुआ... !!
बहुत अच्छा लिखा। सांस लिये हुये एक जमाना हुआ। क्या बात है!
"kahin likhe the teri haath kee lakiron me , hame haiat hai ki tumane nahin dekha kaise"
haath ke lakiron me bhee koi dikhta hai, ye kalpna kewal aap hee karsakti hai.
narayan narayan
खूने- दिल से लिखा, अश्कों ने मिटा डाला,
तुझे भुलाने का क्या खूब बहाना हुआ....
bahut khoob har baar ki tarah gahraa aur adhik gahraa
रूह सिसकती रही, जख्म मूक दर्शक,
साँस लिए भी जैसे एक जमाना हुआ
बहुत सुंदर
खूने- दिल से लिखा, अश्कों ने मिटा डाला,
तुझे भुलाने का क्या खूब बहाना हुआ....
सीमा जी, आप की कविताओं में बहुत दर्द व तड़प होती है. मुझे लगता है की आपने दर्द को काफी करीब से जिया है. ये आपके दिल की गहराइयों से निकल कर शब्दों के रूप में आपकी कविताओं के माध्यम से हमारे दिलों में भी उत्तर जाता है.
वाह मोहतरमा,
एकदम भीषण (इसे बंगाली अंदाज़ में लीजिये) बात हो चली है आपकी ग़ज़लों और पेशकशों में.
कोई जवाब ही नहीं, यकतर्फ़ा ! हाँ जी और बेहद उम्दा !
मगर भूतनाथ जी भी ठीक कह रहे हैं. हा हा !
सीमाजी, इन बेशक़ीमती लाल-ओ-जवाहिरातों को सम्भाल कर रखियेगा. ये आइन्दा ज़माने में दीवान की शक्ल ज़रूर हासिल करेंगे. मेरा दावा है.
शुभकामनाओं सहित !
सीमा जी अब अपनी रचना लिखने से पहले मुझे शब्द बता दिया करो ताकि मैं आपकी तारीफ में कुछ बोल सकूं अच्छी रचना
खूने- दिल से लिखा, अश्कों ने मिटा डाला,
तुझे भुलाने का क्या खूब बहाना हुआ....
bahut khuuuuuuuuuuuuuuub!
dard ki aah se nikla afsaana!
lajwab itni umda itni dilchasp kiya kahu.
realy is too good
dher sari badhiyao ke sath sukriya jo aap hume itni acchi acchi rachnaye padhati rehti hai
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